निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १४० ) ५ अ० १पा० ६ खं० “येन स्मा सिनं भरथःसखिभ्यः” (ऋ०सं०३,४,९,१) इत्यपि निगमो भवति ॥ ‘सिन’ (२८) शब्द अनवगत है । ‘सिनाति’ (बांधता है) यह शब्दयुक्ति है । ‘अन्न भवति’ (अन्न है) यह अभिधेय (अर्थ) वचन है । अर्थ- ‘ सिन ’ अन्न होता है । क्योंकि-वह सब भूतों ( प्राणियों ) को सींता ( बांधता ) है । हे इन्द्रावरुणा देवो ! ‘ येन ’ जिस माहाभाग्य ( बड़ी महिमा ) के कारण ( युवाम् ) तुम दोनों ‘ सखिभ्यः ’ समान ज्ञान वाले यजमानों के लिये ‘सिनम् ’ ( अन्नम् ) अन्न को ‘भरथः’ पूरते हो ( ‘स्म’ पाद् पूरण है ।) ॥ यह भी निगम है अन्न को ही प्राय करके यजमान मांगते हैं, इस लिए यही ‘सिन’ शब्द अन्न का ही वाचक होता है । ‘धन्व’ और ‘सिन’ इत्यादि कई शब्द अपने २ अर्थ में नैघण्टुक प्रकरण में भी पढे गए हैं,तो भी यहां (नैगमकाण्ड में) कोई अनवगत संस्कार होनेके कारण और कोई अनेकार्थ होने के कारण पढ़ेगए हैं ॥ [निघ०] इत्था ॥२६॥ (निरु०) ‘इत्था’‘अमुथा’-इत्येतेन व्याख्यातम्॥५॥ अर्थः-‘इत्था’ ( २६ ) यह निपात है । इस की व्याख्या ‘अमुथा’ ( ३, १६ ) शब्द के समान है । (निघ०-) सचा ॥ ३० ॥ [निरु०-] ‘सचा’ सह-इत्यर्थः । “वसुभिः सचा भुवा ” ( ऋ० सं०६, ३, १४, १ )