निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त (१३६) ५ अ० १ पा० ६ खं० के समान पैनी पूठी से 'व्ययुः' भेदन कर दिया।" ये भी निगम हैं। (यहां रथ और भेदन क्रिया के सम्बन्ध से 'पवि' शब्द का नेमि (पूठी) अर्थ है)। (निघ०-) वक्षः ॥२६॥ [निरु०] 'वक्षो' व्याख्यातम् । अर्थ-'वक्षः' (२६) इस शब्द का “उपो अदर्शि शु- न्ध्यवः” (नि० अ० ४ पा० २ खं० ८) मन्त्र पर व्याख्यान किया जा चुका है ॥ [निघ०-] धन्व ॥२७॥ [निरु०] 'धन्व' अन्तरिक्षम् । धन्वन्ति-अस्मात् आपः । “तिरो॒धन्वा॑तिरोचते” (ऋ० सं० ८,८,४५,२) इत्यपि निगमो भवति ॥ धन्व (२७) शब्द अनवगत है। 'धन्व' (२७) क्या ? अन्तरिक्ष । क्यों ? इससे जल गिरते हैं। क्या निगम है ! “तिरो धन्वातिरोचते” अर्थात्-जो आदित्यरूप अग्नि 'तिरः' अतिविस्तार युक्त 'धन्व' आकाश देशको 'अति' अतीत्य, लांघ करके 'रोचते' हमारे प्रति प्रकाश करता है। यह भी निगम है। (यहां आदित्य की स्तुति के संबन्ध से 'धन्व' अन्तरिक्ष (आकाश) का नाम है) ॥ [निघ०-] सिनम् ॥ २८ ॥ (निरु०-) सिनम्-अन्नं भवति । सिनाति भूतानि ।