भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 555

हिन्दी निरुक्त ( १३८ ) ५ अ० १ पा० ६ खं० ब्राह्मण यज्ञ कर्म में 'शतक्रतो' हे इन्द्र ! 'त्वा' तुझे 'वंशम्-इव' बांस को जैसे 'उद्येमिरे' उठाते हैं। अर्थात् स्तुतियों और हवियों से तेरी हो महिमा को बढ़ाते हैं। इस प्रकार यहां 'अर्क' शब्द से “अर्कम्” इस पदमें देवअर्थ और “अर्किणः” पद में मन्त्र अर्थ है। 'अर्क' शब्द का वृक्ष या आक अर्थ प्रसिद्ध ही है, इस से उस का निगम नहीं दिया । [निघ०-] पविः ॥ २५ ॥ [निरु०] 'पविः' (२५) रथनेमिर्भवति । यद्विपुनाति भूमिम् । “उत पव्या रथानामद्रिं भिन्दन्त्योजसा ।” ( ऋ० सं० ४, ३, ९, ४, ) “तं मरुतः क्षुरपविनाव्ययुः” इत्यपिनिगमौ भवतः ॥ अर्थ-'पवि' ( २५ ) शब्द अनवगत है, और रथ की नेमि (पूठी या पृथ्वी में टिकने वाली पहिये की धार) का नाम है। क्योंकि-वह पृथ्वी को पवित्र करती या खोद देती है। “हे मरुतो ! 'उत' और 'रथानाम्' रथों की 'पव्या' पूठी से 'अद्रिम्' (मेघम्) मेघ को तुम 'ओजसा' बल से 'भिन्दन्ति' भेदन कर देते हो । ( पुरुष का व्यत्यय वैदिक है ) ॥” “ 'मरुतः' मरुतों ने 'तम्' उस मेघ को 'क्षुरपविना' खुरे