भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 554

हिन्दी निरुक्त (१३७) ५ अ० १ पा० ६ खं० अर्को मन्त्रो भवति यद्-अनेन अर्चन्ति । अर्कम्-अन्नं भवति, अर्चति भूतानि । अर्को वृक्षो भवति संवृतः कटुकिम्ना ॥५ (४) ॥ ‘अर्क’ (२४) यह शब्द अनेकार्थ है । अर्थ-‘अर्क’ देव होता है । क्योंकि-इसे सब पूजते हैं । ‘अर्क’ मन्त्र होता है । क्योंकि-इस से अर्चन ( पूजन ) करते हैं । ‘अर्क’ अन्न होता है । क्योंकि-वह भूतों ( प्राणियों ) को अर्चता ( पूजता ) है । ‘अर्क’ वृक्ष ( आक ) होता है, क्योंकि-वह कडुवे पन से व्याप्त होता है ॥ ५ ( ४ ) ॥ ( खं० ६ ) [निरु०] “गायन्ति त्वा गायत्रिणोऽर्चन्त्यर्कमर्किणः, ब्रह्माणस्त्वा शतक्रत उद्वंशमिव येमिरे ॥” ( ऋ० सं० १, १, १९, १, ) गायन्ति त्वा गायत्रिणः, प्रार्चन्ति ते अर्कम्-अर्किणो ब्राह्मणाः । त्वा शत- क्रतो ! उद्येमिरे वंशमिव । वंशः, वनशयोभवति। वननात् श्रूयते इतिवा ॥ ‘अर्क’ शब्द के देव और मन्त्र अर्थ में निगम— अर्थ- “गायन्ति त्वा०” अर्थात्-हे भगवन् ! इन्द्र ! ‘गायत्रिणः’ ( सामगाः ) साम-गान करने वाले स्तुतियों द्वारा ‘गायन्ति’ गाते हैं । ‘अर्किणः’ ( मन्त्रिणो होतारः ) मन्त्रों वाले होता लोग ‘अर्कम्’ तुझ अर्चनीय को ‘अर्चन्ति’ प्रार्चन्ति ऋचाओं द्वारा पूजते हैं । ‘ ब्रह्माणः ’ ( ब्राह्मणाः ) ये सब १८