भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 553, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 553

हिन्दी निरुक्त ( १३५ ) ५ अ० १ पा० ५ खं० “पश्यन्हिरण्यचक्रानयोदंष्ट्रान्विधावतोवराहून्” (ऋ०सं० १, ६, १४, ५) ॥४॥ अर्थः-और भी मध्यम लोक के देव-गण 'वराहु' कहे जाते हैं। “हे मरुत् देवगणों ! गोतम ऋषि तुम्हें 'हिरण्यचक्रान्' सोने के चक्रवालों, 'अयोदंष्ट्रान्' लोहे के रथ वालों, 'विधा- वतः' नाना प्रकार दौड़ते हुओं 'वराहू' वराहु नाम वालों को 'पश्यन्' (स्तौति) स्तुति करता है” ॥ ४ ॥ (खं० ५) (निघ०-) स्वसराणि ॥२२॥ (निरु०) स्वमराणि अहानि भवन्ति । स्वयं सा- रीणि । अपिवा स्व-आदित्यो भवति, सः एनानि सारयति । “उस्रा इव स्वसराणि” । (ऋ० सं० १, १, ६, २) इत्यपि निगमो भवति । 'स्वसराणि' (२२) यह अनवगत है । 'स्वयंशारीणि' यह अवगम है । 'अहानि' (दिन) अर्थ कथन है । अर्थः-'स्वसर' अहन् (दिन) होते हैं। क्योंकि-वे स्वयम् (आप) सरण (गमन) करते हैं, या आपसे आप चले जाते हैं । अथवा 'स्वर' आदित्य होता है, वह इन को सारण करता (चलाता) है । “उस्रा इव स्वसराणि” अर्थात्-“'इव' जिस प्रकार 'उस्राः' रश्मियें 'स्वसराणि' (अहानि) दिनों के प्रति ( शीघ्र