निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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हिन्दी निरुक्त ( १४४ ) ५ अ०२ पा० १ खं०
अग्निः पवित्र मुच्यते । वायुः पवित्र मुच्यते ।
सोमः पवित्रमुच्यते । सूर्य्यः पवित्रमुच्यते । इन्द्रः
पवित्रमुच्यते ।
“अग्निः पवित्रं स मा पुनातु वायुः सोमः सूर्य्य
इन्द्रः पवित्रं ते मा पुनन्तु” इत्यपि निगमो भवति ।
तोदः, तुद्यतेः ॥१ (६) ॥
‘पवित्र’ (३४) अनेकार्थ है । “पुनाते.” यह धातु का निर्देश निर्वचन के
अभिप्राय से है । क्यों कि-वह पवित्र करता है । “मन्त्र पवित्रम्-उच्यते”
(मन्त्र ‘पवित्र’ कहलाता है) इत्यादि अर्थ का कथन है ।
अर्थ-‘पवित्र’ (३४) शब्द ‘पुनाति’ (‘पूञ्’ पवने क्र्या०
प० ) धातु से है । मन्त्र ‘पवित्र’ कहा जाता है ।
“ ‘येन’ जिस ‘पवित्रेण’ पावन मन्त्र से ‘देवाः’ ऋत्विज्
और यजमान ‘सदा’ सदा ‘आत्मानम्’ अपनेको ‘पुनते’ पवित्र
करते हैं” यह भी निगम होता है । इस मन्त्र में ‘देव’ शब्द
स्तुत्यर्थक दिव् (दि० प०) धातु से ऋत्विज् और यजमान का
वाचक है, क्योंकि मुख्य देवता निष्पाप होते हैं, उनका अपने
को पवित्र करना संभव नहीं । “न च वै देवान् पापं
गच्छति” ‘देवताओं को पाप स्पर्श नहीं करता’ यह ब्राह्मण
वाक्य है ।
रश्मिएं (किरणें) पवित्र कहलाती हैं । क्योंकि-वे स्पर्श
से ही पवित्र करती हैं ।
“गभस्तिपूतः” रश्मियों (किरणों) से पवित्र हुआ हुआ ।
“गभस्तिपूतः” किरणों से पवित्र हुआ हुआ “नृभिः”