निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपक्ष में सूर्य की किरणें पी जाती हैं। वैसा भी यह निगम है- यमक्षितिमक्षितयः पिबन्ति" अर्थात् जिस 'अक्षितिम्' (अक्षय) चन्द्रमा को 'अक्षितयः' (अक्षय) सूर्य की रश्मिएं पान करती हैं। बदीमें चन्द्रमाको पान करके वे सूर्यकी किरणें फिर शुक्ल पक्ष (सुदी) आने पर उसे पुष्ट कर देती हैं। वैसा भी यह निगम है।— "यथा देवा अंशुमाप्याय- यन्ति" अर्थात् जिस प्रकार ये सूर्य की किरणें 'अंशुम्' चन्द्रमा को 'आप्याययन्ति' पुष्ट करती हैं, हे यजमान ! उसी प्रकार 'देवाः' देवता तुझे पुष्ट करें ॥ ६ ॥ (खं० ७) [नि०] अध्रिगुः ॥४३॥ आङ्गूषः ॥४४॥ (निरु०) अध्रिगुर्मन्त्रोभवति । गवि अधिकृतत्वात् अपिवा प्रशासनमेव अभिप्रेतं स्यात्, तच्छब्दवत्त्वात् "अध्रिगो शमीध्वं सुशमि शमीध्वं शमीध्वमध्रिगो" इति ॥ अग्निरपिअध्रिगुः- उच्यते।"तुभ्यंश्चोतन्त्य- ध्रिगोशचीवः ।" अधृतगमनकर्मवन् । इन्द्रोऽपि अध्रिगुः उच्यते ॥ "अध्रिगाव ओहामिन्द्राय" (ऋ०सं० १, ४, २७, १) इत्यपि निगमो भवति । आङ्गूषः स्तोम आघोषः ।