भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 572, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 572

हिन्दी निरुक्त ( १५५ ) ५ अ० २ पा० ६ खं० “इन्द्रः सोमस्य काणुका” (इन्द्रः सोमस्य कान्तः) अर्थात् इन्द्र सोमका काणुका ( कान्त ) या प्यारा है, इसी से उसने उसके सरों को पान किया । इस ( कान्त ) अर्थ में 'काणुका' शब्द की शब्द प्रतीति कैसी है ? 'कणो घातः' काम, प्रार्थना, और कणे ये तीनों पद एक ही अर्थ के वाचक है । एवम्-कणोघात, कणोहत, और कान्तिहत ये तीनों समान अर्थ को ही कहते हैं । जो अर्थ 'कणोहतः' से होता है, वही अर्थ 'काणुका' पद से होता है, अर्थात् पीने की इच्छा के समाप्त होने तक इन्द्र सोम के सरों को पीता है। सोम के सरों को पान कर लेने पर पान की इच्छा से रहित या तृप्त इन्द्र 'का- णुका' शब्द का अर्थ है । इस मन्त्र में तीस (३०) सर कहे गये हे, व क्य हे, इसी को बताने के लिये आचार्य पहिले याज्ञिकों के मत को दिखाते हैं— “तहां मन्त्र में इस ‘त्रिंशत्’ (तीस ३०) पद में याज्ञिक लोग यह अर्थ कहते हैं-माध्यन्दिन सवन (कर्म) में एक देवता के तीस उक्थ-पात्र होते हैं । अर्थात् उस माध्यन्दिन सवनमें उक्थ के तीन पर्याय होते हैं,और वे सभी इन्द्रदेवता के होते हैं, उन तीनों ही में दश (१०) दश (१०) चमस (पात्र) होते हैं, वे मिलकर तीस पात्र होजाते हैं । उन्हे इन्द्र देवता एक काल में एक सड़ाके से पी जाता है। वे ही यहां सर कहे जाते हैं” । दूसरा मत “तीस अपर पक्ष ( कृष्ण पक्ष ) के दिन और रात्रि होती हैं, तीस पूर्व ( शुक्ल ) पक्ष के” यह नैरुक्त आचार्य कहते हैं । तब वहां जो ये चन्द्रमा में प्रतिपदा द्वितीया आदि तिथियों में आने वाले ( आपः ) जल हैं, उन्हें कृष्ण

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