निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें“'अभ्रिगवे' (अधृतगमनाय) दूसरेसे नहीं धारण किये हुए गमन वाले 'इन्द्राय' इन्द्र के लिये 'ओहम्' मैं (हवियों को देता हूँ ।) इस प्रकार इन्द्रका विशेषण होनेसे 'अभ्रिगु' इन्द्र का नाम है ॥ 'आङ्गूषः'(४४) यह अनवगत है । स्तोम ( मन्त्र समूह ) अर्थ है । 'आघोषः' यह शब्दसमाधि है । 'आंगूष' क्या ? स्तोम ( मन्त्रसमूह ) । वह क्यों ? आघोष ( फैलकर गूंजने वाला ) है । “एन” (अनेन) इस “आङ्गूषेण”(स्तोमेन) मन्त्र समूह से “वयम्” हम “इन्द्रवन्तः” इन्द्र वाले हैं ॥ इस प्रकार `यह मन्त्र में 'आङ्गूष' शब्दसे स्तोम कहा गया है ॥ (११) ॥ (निघ०-) आपान्तमन्युः ॥४५ ॥ श्मशा ॥४६॥ [निरु०-] “आपान्तमन्युस्तृपलप्रभर्मा धुनिः शिमी- वाञ्छरुमाँ ऋजीषी । सोमो विश्वान्यतसा वनानि नार्वागिन्द्रं प्रतिमानानि देभुः ॥” (ऋ० सं० ८, ४, १४, ५) आपतितमन्युः तृप्रप्रहारी क्षिप्रप्रहारी (सिप्र- प्रहारी) सोमोवा इन्द्रोवा ॥ 'धुनि.' धुनातेः । 'शिमी'-इति कर्मनाम । शमयतेर्वा। शक्नोतेर्वा । ऋजीषी सोमः, यत् सोमस्य पूयमानस्य अति-