भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 577

हिन्दी निरुक्त ( १६० ) ५ अ० २ पा० ७ खं० ‘आपास्तमन्धु’ ( ४५ ) यह अनवगत है और पक्ष में अनेकार्थ है। ‘आपातितमन्यु’ यह अगम है। अर्थ:- ‘आपास्तमन्धुः’ संग्राम में शत्रुओं द्वारा उत्तेजित अथवा क्रोधित हुआ हुआ ‘तृपलप्रभर्मा’ (तृपप्रहारी = क्षिप्र- प्रहारी) शीघ्र प्रहार करनेवाला सोम अथवा इन्द्र-‘धुनिः’ (यदि सोम है।) पात्रों का कंपाने वाला (यदि इन्द्र) शत्रुओं का कंपाने वाला ‘शिमीवान्’ अपने अधिकार-युक्त कर्मवाला ‘शरुमान्’ हिंसावान् ‘ऋजीषी’ (सोम पक्षे-) खूखस- वाला (इन्द्र पक्षे-) जिस के घोड़ों का ऋजीष (खूखस) भाग होता है, (इस प्रकार आधी ऋचा सोम अथवा इन्द्र की है।) (केवल सोम पक्ष में ३रा पाद्-) ऐसे गुणों से युक्त ‘सोमः’ सोम ‘विश्वानि’ सब ‘अतसा’ (अतसामि) कभी न घटने वाले ‘वनानि’ वनों को अथवा जलों को अपनी महिमा से व्यापन करता (व्याप लेता) है। क्यों कि वह उन का अधिपति है। इस प्रकार पहिले के साके के दो पादों को ले कर तीन पाद् सोम के होते हैं। (केवल इन्द्र पक्ष में ४था पाद्-) ‘इन्द्रम्’ इन्द्र को ‘न प्रतिमानानि’ नहीं मान (स्तुति) करने वाले ‘अर्वाक्’ पहिले ही (इन्द्र के मिलने से) ‘देभुः’ दब जाते (तिरस्कृत हो जाते) हैं। इस प्रकार इस मन्त्र में तीन पाद् सोम के और तीन पाद् इन्द्र के हैं, तथा यह मन्त्र दो देवताओं का (उभय दैवत) है॥ निरुक्तार्थ:- ‘आपातितमन्यु’ आगिरा है क्रोध जिस को, तृपप्रहारी क्षिप्र (शीघ्र) प्रहार करने वाला अथवा सोम अथवा इन्द्र॥ ‘धुनि’ कंपाने वाला। ‘धुञ्’ कम्पनार्थक (स्वा० उ०) धातु का है।