भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 579

हिन्दी निरुक्त ( १६२ ) ५ अ० ३ पा० १ खं० ऋचा इन्द्र को ही प्रधानता से कहती है, सोम कर्म गौणता से है। ( इस मतमें तीसरे पाद में सोम-कर्म उपमा होजाता है। जिस प्रकार सोम सब अक्षय धमों को व्यापता है, उसी प्रकार “आपान्तमन्यु” आदि सकल विशेषणों वाला इन्द्र सब जगत् को व्यापता है। इस प्रकार चारों ही पाद इन्द्र देवता के हो जाते हैं।) ‘दोनों देवताओं की प्रधानता है’ यह दूसरा मत है॥ ‘इमशा’ (४६) यह अनवगत है। ‘श्वाशिनी’ या ‘श्माशिनी’ यह अवगत है ‘श्वाशिनी’ शीघ्र खाने वाली या शीघ्र व्यापन करने वाली कुल्या अथवा नदी है। ‘श्माशि’ श्म (शरीर) को व्यापन करने वाली नाड़ी होती है। इस प्रकार इसके भिन्न २ प्रकार से विभाग करने से यह ( श्मशा ) शब्द अनेकार्थ भी होता है। ‘श्मशा’ अथवा ‘शु-अश्नुते’ जलदी व्यापन करती है। अथवा ‘श्म-अश्नुते’ शरीर को व्यापती है। “अवश्मशा रुधद्वाः” ‘वाः’ जल या रस ‘श्मशाः’ नदियों को या नाड़ियों को ‘अवरुधत्’ आवरण करेगा ॥ ( इस प्रकार इस मन्त्रमें ‘श्मशा’ शब्द नदी या नाड़ी का नाम होता है ) ॥ इति हिन्दीनिरुक्ते पञ्चमाध्यायस्य द्वितीयःपादः समाप्तः ॥५,२॥ तृतीयः पादः। ( खं० १ ) [निघ०-] उर्वशी ॥ ४७ ॥ [निरु०-] उर्वशी अप्सराः। उरु-अभ्यश्नुते। उरु- भ्यामश्नुते। उरुर्वा वशोऽस्याः ॥