निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ
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हिन्दी निरुक्त ( १६३ ) ५ अ० ३ पा० १ खं०
अप्सराः, अप्सारिणी । अपिवा अप्स इति रूप
नाम । अप्सातेः । अप्सानीयं भवति । आदर्शनि-
यम् । व्यापनीयंवा । स्पष्टं दर्शनाय-इति शाक-
पूणिः ॥
यत्-अप्सैः-इति अभक्षस्य । “अप्सो नाम”
इति व्यापिनः ।
तद्रा भवति, रूपवती, तत् अनया आत्तम्-इतिवा
तत्-अस्यै दत्तम्-इतिवा ॥
तस्या दर्शनात् मित्रावरुणयो रेतश्चस्कन्द, तद-
भिवादिनी एषा ऋग् भवति ॥ (१३) ॥
'उर्वशी'(४७) शब्द अनवगत है । 'अप्सरा' यह अर्थ-कथन है । 'उर्वभ्या-
श्नुते' ( उरु ( महत् ) बड़े यश को व्यापन करती है ।) यह व्युत्पत्ति है ।
अथवा 'उरुभ्याम्' 'अश्नुते' (जांघों से मैथुन धर्म में पुरुष को व्याप्त लेती है ।
अर्थात्--'उर्वाशिनी' होने से 'उर्वशी' कही जाती है । अथवा 'उरुः अस्याः वश.'
क्यों कि--महान् काम (प्रयोजन) इस के वश (अधीन) है इससे यह
'उरुवशिनी' होने से 'उर्वशी' कही जाती है । ये शब्द-समाधिएं है ॥
अर्थ-'उर्वशी' (४७) अप्सरा है । क्यों कि-'उरु' बहुत
(यश) को अशन (व्यापन) करती है । (या-) उरुओं (जांघों) से
पुरुष को अशन (व्यापन) करती है । अथवा उरु (महान्)
काम इसके वश है ॥
'अप्सराः' क्यों ? अप्सारिणी या जल के प्रति नित्य ही
सरण (गमन) करती है । (क्यों कि वह उससे उत्पन्न हुई है,
इससे वही उस का प्रिय है ।) इस से 'अप्सरा' है । अथवा