निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १७६ ) ५ अ० ३ पा० ६ खं० अपां जग्मिं निचम्पुणः" [ ] प॒त्नीव॑न्तः सु॒तां इ॒मे अ॒द्भिः॒ सोमा॑ः काम॑यमा- ना य॑न्ति वी॒तये॑ पानाय अपां गन्ता निचम्पुणः ॥ समुद्रोऽपि निचम्पुण उच्यते । निचमनेन पूर्यते ॥ अवभृथोऽपि निचम्पुण उच्यते । नीचैरस्मिन् क्णन्ति । नीचैर्दधति-इतिवा ॥ “अवभृथ निचम्पुण”—(य० वा० सं० ३, ४८) इत्यपि निगमो भवति ॥ निचुम्पुण निचेङ्कण इति चे । पदि गन्तु र्भवति । यत् पद्यते-॥ ६ [१८] ॥ 'पत्नीवन्तः' इसका कक्षी नाम आंगरस ऋषि ह । गायत्री छन्द, इन्द्र देवता, और रात्रि पर्यायों में मध्यम पर्यायमें होताके शस्त्रमें विनियुक्त है । अर्थ:-(अद्भिः) 'पत्नीवन्तः' जलों से पत्नियों वाले 'सुताः' निचोड़े हुए 'इमे' ये (सोमाः) सोम 'उशन्तः' (कामयमानाः) 'इव' चाहते हुये जैसे, 'वीतये' पान के अर्थ 'यन्ति' देवताओं के प्रति जाते हैं, कि-कैसे हमें ये पान करें । क्या यहीं ? न, 'अपांम्' जलों के वीर्य से युक्त फिर फिर 'निचुम्पुणः' सोम 'जग्मिः' (गन्ता) जाने वाला होता है । समुद्र भी 'निचुम्पुण' कहलाता है । क्योंकि वह निचमन (जल) से भरा हुआ रहता है । निचमन (भक्षण) किया जाता है, इसी से 'निचमन' जल है । अवभृथ (यज्ञ के अन्त में स्नान विशेष) भी 'निचुम्पुण' कहलाता है । क्योंकि इस में धीरे धीरे बीजा जाता है। अथवा