निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'अङ्ग' यह क्षिप्र या शीघ्र का नाम है। क्योंकि वह 'अञ्चित' ही अङ्कित होता है। अर्थात् अञ्चित से अङ्कित और उस से अङ्ग बन जाता है। जो शीघ्र होता है, वह अञ्चित या गया हुआ ही होता है इसी से 'अङ्ग' है। निचुम्पुण (६२) यह अनवगत और अनेकार्थ है। 'निचुम्पुण' सोम होता है। क्योंकि वह 'निचान्तपृण' होता है, अर्थात्-भक्षित (खाया हुआ) ही प्रीति करता है ॥ ५ (१७) ॥ व्याख्या । भगवद्दुर्गाचार्य अपने समय में “कदा मर्त्तम्” इस मन्त्र के भाष्य को “पादेन क्षुम्पमिव अवस्फुरसि” और “कदा नः शृणोति गिरः” ऐसा पाते हैं, किन्तु इस पाठ को 'स्फुरसि' 'शृणोति' इन क्रियाओं के विरुद्ध पुरुषों के कारण छोड़ देते हैं, और अर्थ के अनुसार भाष्य का पाठ 'स्फुरसि' के स्थान में 'स्फुरिष्यति' ऐसी प्रथम पुरुष की क्रिया से बदल कर उस की व्याख्या करते हैं। क्योंकि “तू मारेगा” “वह सुनेगा” ऐसे प्रत्यक्ष और परोक्ष दो वाक्य एक ही देवता के लिये संभव नहीं होते। वे कहते हैं कि-भाष्यका यह पाठ ठीक है ? या बेठीक ? मुझे इससे कुछ नही, किन्तु भाष्यका ठीक पाठ ढूंढना चाहिये, और मुझे ऐसा ही प्रतीत होता है, जैसा कि मैंने व्याख्यान किया ॥ ५ (१७) ॥ ( खं० ६ ) (निघ०) पदिम् ॥६३॥ (निरु०) “पत्नीवन्तः सुता इम उशन्तो यन्ति वीतये।