निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ
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हिन्दी निरुक्त ( १७७ ) ५ अ० ३ पा० ५ खं०
'क्षुम्पम्' (६१) यह अनवगत है । 'अहिच्छत्र' यह अर्थ है ।
'क्षुम्प' ( ६१ ) अहिच्छत्र ( छत्राक ) या सांपका छाता
होता है । चौमासे में पृथिवी में गली हुई लकड़ी फूलकर छाते
के आकार से बाहर निकल आती है, उसे लोक में सांप का
छाता कहते हैं । ' क्षुम्प ' क्यों ? वह छूने से क्षोभ को प्राप्त
होता है, या बिगड़ जाता है ॥ - ॥ ४ ( १६ ) ॥
( खं० ५ )
(निघ०-) निचुम्पुणः ॥६२॥
[निरु०] "कदा मर्त्तमराधसम्पदाक्षुम्पमिव स्फुरत् ।
कदा नः शुश्रवद्गिरइन्द्रो अङ्ग ।" [ऋ०सं०१,६,६,३]
कदा मर्त्तम्-अनाराधयन्तं पादेन क्षुम्पमिव
अवस्फुरिष्यति कदा नः शृणोति च गिरः इन्द्रो
अङ्ग ।
'अङ्ग' इति क्षिप्रनाम। अञ्चितमेव अङ्कितं भवति
'निचुम्पुणः' सोमः । निचान्तपृणः । निचमनेन
प्रीणाति ॥ ५ [१७] ॥
“कदा मर्त्तम्” यह गोतम ऋषिकी ऋचा है । इन्द्र देवता है। उष्णिक् छन्द
और तृतीयसवन के उक्थपर्यायों में ब्राह्मणाच्छंसी के शस्त्र में विनियुक्त है ।
'कदा' कब 'इन्द्रः' इन्द्र 'अनाराधसम्' (अनाराधयन्तम्)
न आराधन करते हुये 'मर्त्तम्' मनुष्य को 'पदा' (पादेन) पैर
से 'क्षुम्पम्' ( अहिच्छत्रकम् ) सांप के छाते के 'इव' समान
'स्फुरत्' ( अवस्फुरिष्यति ) कुचलेगा । 'कदा' कब 'नः' हमारी
'गिरः' वाणियों ( स्तुतियों ) को 'इन्द्रः' इन्द्र 'अङ्ग' झट पट
'शुश्रवत्' ( शृणोति = श्रोष्यति ) सुनेगा ।
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