निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ
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हिन्दी निरुक्त ( १७६ ) ५ अ० ३ पा० ४खंड
“अवन्दन्त वीलिता” अर्थात्-'वीलिता' (वीलितानि
गर्वितानि) गर्ववाले असुर-कुल 'अवन्दन्त' मृदु या ढीले हो
गए । यह भी निगम है।
यहां 'वीलयति' धातु और 'व्रीलयति' धातु संस्तम्भ
या गर्व (कठोर-भाव) के वाचक होते हुए पूर्व पठित 'व्रन्द'
धातु से सम्बन्ध युक्त पढे गए हैं, इस से 'व्रन्द' धातु कोमल
भाव अर्थ का वाचक ठहरता है। क्योंकि-कठोर असुर-कुलों
का कोमल होने के अतिरिक्त क्या होता ? ।
'निष्षपी' (५६) यह अनवगत है । 'विनिर्गतसप.' यह शब्दसमाधि है ।
स्त्री-काम (पुश्चल) या जार इसका अर्थ है ।
'निष्षपी' (५६) स्त्री की कामना रखने वाला होता है।
क्योंकि-वह विनिर्गत-सप (जिस का सप (पुरुष चिन्ह)
निकला हुआ हो) ही रहता है।
'सप' शब्द स्पर्श अर्थके वाचक 'सप' (भ्वा०प०) धातु
से है। क्योंकि-उससे स्त्री योनि सपी (छूही) जाती है।
“ 'यः' जो 'निष्षपी' जार है, 'सः' वह 'मघा-इव'
(यथा धनानि) जैसे धनों को (विनाशयति) नष्ट करदेता है,
(तथा) उस प्रकार 'मा' मत् 'नः' हमें 'परादाः'बरबाद कर ॥”
'तूर्णाश' (६०) यह अनवगत है । “उदक भवति” यह अर्थ-कथन है ।
'तूर्णाश' (६०) उदक (जल) होता है। क्योंकि-वह
तूर्ण (शीघ्र) ही अशन (व्यापन) करता है।
“मेघार्थी जन 'गिरेः-अधि' मेघके ऊपर वर्त्तमान 'तूर्णा-
शम्' जलको 'इव' जैसे (आह्वयन्ति) बुलाते हैं।” यह भी
निगम है। यहां गिरि (मेघ) के सम्बन्ध से 'तूर्णाश' नाम
जलका ही हो सकता है ।