निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १७५ ) ५ अ० ३ पा० ४ खं० “मानो मघेव निष्पणी परादाः ।” ( ऋ० सं० १, ७, १८, ५) स यथा धनानि विनाशयति मानस्त्वं तथा परादाः ॥ ‘तूर्णाशम्’ उदकं भवति । तूर्णमश्नुते । “तूर्णाशं न गिरेरधि” [ ऋ० सं० ६,३,१,४ ] इत्यपि निगमो भवति ॥ ‘क्षुम्पम्’ अहिच्छत्रकं भवति । यत् क्षुभ्यते— ४ [ १६ ] ॥ ‘नियद्वृषासि’ यह सव्य आंगिरस ऋषि की ऋचा है। जगती छन्द और इन्द्र देवता है। वह इन्द्र ही अंगिरस् का पुत्र होगया है। अर्थ—हे भगवन् ! इन्द्र ! ‘यत्’ जो (तू) ‘श्वसनस्य’ (शब्दकारिणः) शब्द करने वाले वायु के ‘च और ‘व्रन्दिनः’ अपने तेज से फल आदि को कोमल बनाने वाले ‘शुष्णस्य’ (शोषयितुः) (आदित्यस्य) सूर्य के ‘मूर्द्धनि’ ऊपर ‘रोरुवत्’ (रोरूयमाणः) गर्जता हुआ ‘वना’ (वनानि) जलों को ‘निवृक्षासि’ (विक्षसि) फेंकता है। अर्थात् ऊपर और नीचे जलों को फेंकते हुए तेरी शक्ति कभी घटती नहीं। यहां जिस पक्ष में “वना” पद का ‘मेघवधेन’ (मेघ के वध से) ऐसा निर्वचन करते हैं, उस पक्ष में ‘निवृक्षासि’ क्रिया में जोड़ने के लिये ‘उदकानि’ (जलों को) यह पद ऊपर से ले लिया जाता है। इस प्रकार ‘व्रन्दी’ शब्द आदित्य का विशेषण हो कर मृदु (कोमल) भाव अर्थ के वाचक ‘व्रन्द’ (भ्वा० प०) धातु का ही ठीक होना है।