भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 590

हिन्दी निरुक्त ( १७३ ) ५ अ० ३ पा० ३ खं० ' ओं सहित 'सजोषः' प्रसन्न होता हुआ 'तौर्याणः' अपने यान (विमान) को दौड़ाता हुआ 'यज्ञम्' हमारे यज्ञ को 'उप- याहि' आ ॥ यह भी निगम है ॥ 'अह्रयाण' ( ५५ ) क्या ? अह्रीतयान वह क्या ? अल- ज्जितयान=दूसरे यान से न लज्जित होने वाला यान । “ हे अग्ने ! 'अनुष्ठुया' (अनुष्ठानेन) कर्मसे वह ‘कृणुहि' कर, जो हम चाहते हैं। हे 'अह्रयाण' ! अलज्जित-यान (नहीं लज्जित होने वाले यान वाले ! ) ” यह भी निगम है ॥ 'हरयाण' (५६) क्या ? हरमाण-यान वह क्या ? जिस का यान सदा चलता ही रहे । “ ऋज्र मुक्षण्यायने रजतं हरूयाणे । रथं युक्त मसनाम सुषामणि” (ऋ०सं० ६,२,२५,२) विश्वमना वैयश्वः ऋषि की यह ऋचा है। उष्णिक् छन्द है। इससे यान की स्तुति की जाती है। वह कहता है— “ हमने 'हरयाणे' नित्य चलू यान वाले 'सुषामणि' सुन्दर सामवेद वाले 'उक्षण्यायने' 'उक्षणयायन' नाम वाले यजमान में (से) 'ऋज्रम्' सीधा चलने वाला 'रजतम्' चांदी का 'रथम्' रथ 'युक्तम्' घोड़ोंसे जुड़ाहुआ (असनाम) पाया । ” यह भी निगम है। यहां शब्द की समानता और अर्थ की योग्यता से "हरयाण" शब्द "हरमाणयान" से प्रतीत होता है। भगवद् दुर्गाचार्य ने 'उक्षणयायन' नाम किसी यजमान विशेष का बताया है। किन्तु 'उक्षन्' नाम बैल का है, और यान नाम सवारी का है, इन दोनों के योग से 'उक्षणयान