निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १७२ ) ५ अ० ३ पा० ३ खं० 'गध्यति' ( 'गध्' दि० प० ) धातु मिश्रीभाव (मिलाने) अर्थ में है । "आगधिता" सम्मुखता से पकड़ी हुई "परि- गधिता" (परिष्वक्ता) दोनों भुजाओं से सुख से लिपटाई हुई । यह भी निगम है ॥ यहां मैथुन के संबन्ध से और शब्द की समानतासे 'गध्' धातु का मिश्रीभाव या मिलाना अर्थ है । 'कौरयाण' (५३) क्या ? कृतयान वह क्या किया हुआ यान । “यं मेदुरिन्द्रो मरुतः पाकस्थामा कौरयाणः । विश्वेषां त्मना शोभिष्ठमुपेव दिवि धावमानम् ॥ ( ऋ० सं० ५, ७, २९, १ ) मेधातिथि कण्व ऋषि की यह ऋचा है । इससे आकाशयान की प्रशंसा की है । 'यम्' जो यान 'मे' मुझे 'इन्द्रः' इन्द्र ने और 'मरुतः' मरुतों ने 'दुः' दिया है, वह 'पाकस्थामा' बड़ा पक्का (दृढ) है, 'कौरयाणः' अनेक सुधारों से सत्कार किया हुआ है, अतएव 'विश्वेषाम्' सब यानों के मध्य में 'त्मना' अपने स्व- रूप से 'शोभिष्ठम्' बहुत सुन्दर (अनेक रत्नों से चित्र विचित्र) और 'दिवि' आकाश में 'उपधावमानम्' दौड़ने वाला है ॥ यह भी निगम है । 'तौर्याण (५४) क्या ? तूर्णयाम वह क्या ? शीघ्र चलने वाले यान वाला “ हे इन्द्र ! 'सः' सो तू 'मरुद्भिः' 'सखिभिः' मरुत् सखा-