निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 588, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १०१ ) ५ अ० ३ पा० ३ खं० समझ कर उस पर पतन ( गमन ) करते हैं, इसी से सोम वाजपस्त्यं है। इस प्रकार शब्दकी समानता और अर्थ की उपपत्ति होने से यहां 'वाजपस्त्य' नाम सोम का है। 'वाजगन्ध्य' (४८) इसमें 'गध्' (दि०प०) धातु उत्तरपद है- 'वाज' शब्द और 'गध्' धातु के मेल से है। यह शब्द भी पूर्वोक्त "सनेम वाजपस्त्यम्” निगम का ही है, केवल भेद यह है कि-मन्त्र मे समाम्नाय के क्रमकी अपेक्षा विपरीत क्रम से आता है । "वाजपस्त्यम्" (४६) "वाजगन्ध्यम्" (५०) यह समाम्नाय ( निघण्टु ) का क्रम है, और निगम में-"अश्याम वाजगन्ध्य, सनेम वाजपस्त्यम्" (ऋ०सं० ७, ४, २४, ६) अर्थात्-"हम 'वाजगन्ध्यम्' वाज ( अन्न ) की गन्ध वाले (सोम) को पावें, हम वाजपस्त्य ( जिसे देवता अपना अन्न समझ कर पाते है, ) को भजें" यह क्रम है । अतः समाम्नाय ओर निरुक्त के आचार्य का भेद अभेद का यह भी विचार स्थल है । देखो चतुर्थाध्याय की भूमिका ॥ “अश्याम वाजगन्ध्यम्” (हम) 'वाजगन्ध्यम्' सोम को 'अश्याम' भजें । यह भी निगम है ॥ 'गध्य' (५१) यह शब्द अनवगत है । ग्रहणार्थक 'ग्रह' (क्र्या० उ०) धातु का है । (ग्रहणीय ( ग्रहण करने योग्य ) यह अर्थ की प्रतीति है ।) “हे इन्द्र ! युद्ध में शत्रुओंके समान अपनेको “युयूषन्” भिड़न्त करने की इच्छा करता हुआ “ऋज्रा” सीधे राह से “वाजे-न” अन्न के समान 'गध्यम्' ग्रहण-योग्य वस्तु को सम्मुख भाव से भज" यह भी निगम है ॥ 'गधिता' (५२) शब्द में 'गध्' (दि०प०) धातु अप्रतीतार्थ है । इस का अर्थ जान नहीं पड़ता । सो मिश्रीभाव अर्थ में है । मिश्रीभाव मिलाने का नाम है ।