निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १७० ) ५ अ० ३ पा० ३ खं० इत्यपि निगमो भवति ॥ 'अह्रयाणः' अह्हीतयानः । “अनुष्ठयाकृण्वद्यह्रयाण” (ऋ०सं०३,४,२५,४) इत्यपि निगमो भवति ॥ 'हरयाणः' हरमाणयानः । “रजतं हरयाणे” ( ऋ० सं० ६, २, २५,, २ ) इत्यपि निगमो भवति ॥ “य आरितः कर्मणि कर्मणि स्थिरः” (ऋ०सं० १, ७, १२, ४ ) । प्रत्युतः स्तोमान् ॥ 'बन्दी' बन्दते मृदुभावकर्मणः- ॥ ३ [१५] ॥ अर्थः—हे भगवन् ! इन्द्र! जैसा कि-हम तुझे वर्णन कर चुके हैं 'सः' सो तूने इत् ( एतत् ) इस ' अवयुनम् ' अज्ञान रूप 'तमः' अँधेरे को 'ततन्वत्' फैलाया । 'सः' सो तूने ही 'तम्' उस (इस) लोक को 'सूर्येण' सूर्यरूप अपने प्रकाश से ' व- युनवत्' ( प्रज्ञानवत् ) ज्ञानयुक्त 'चकार' किया। इस प्रकार इस मन्त्र में ' तम फैला कर सूर्य से वयुनवत् करता है, इस सम्बन्ध के द्वारा 'वयुन' शब्द प्रज्ञान ( प्रकाश ) का वाचक होता है ॥ ' वाजपस्त्य ' ( ४६ ) क्या ? वाजपतन । वह क्या ? जिस पर वाज ( अन्न ) समझ कर देवता पतन करें ( गिरें) । ' हम ' वाजपस्त्यम् सोम को ' सनेम ' भजें '—यह भी निगम है । 'वाजपस्त्य'-देवता लोग सोम को अपना वाज ( अन्न)