निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १८१ ) ५ अ० ३ पा० ७ खं० निर्णिजो न मुच्यते ” ( ऋ०सं० ७, ७, १९,४ ) आविष्कुरुते भासमादित्यो गूहते बुसम् । ‘बुसम्’-इति उदक-नाम। ब्रवीतेः शब्दकर्मणः भ्रंशतेर्वा । यद्वर्षन् पातयति उदकम् रश्मिभिः तत् प्रत्यादत्ते ॥ ७ ( १९ ) ॥ इति पञ्चमाध्यायस्य तृतीयः पादः समाप्तः ॥५,३॥ “ सुगुरसत् ” इसका कक्षीवान् ऋषि है। अर्थः-जो ही ‘ सुगुः ’ ( शोभनगुः ) सुन्दर वाणी वाला होता है, वह ‘सुहिरण्यः’ सुन्दर सुवर्णवाला होता है, ‘स्वश्व’ सुन्दर अश्व ( घोड़े ) वाला होता है, ‘च’ और ‘इन्द्रः’ इन्द्र ‘अस्मै’ इसके लिये ‘महत्’ बड़ा ‘वयः’ आयु ‘दधाति’ देता है। ‘यः-तु’ किन्तु जो ‘प्रातरित्वः’ हे (प्रातरागामिन् अतिथे ! ) प्रात काल आने वाले ! अतिथि देव ! ‘आयन्तम् ’ आये हुये ( भूख से विचलित हुए प्राण अभ्यागत) को ‘वसुना’ (अन्नेन) अन्नसे ‘उत्सिनाति’ बांधता है। कैसे ? ( कुमारः ) बालक या मूढ ‘मुक्षीज्या’ ( पाश्यया ) जाल से ‘पदिम्’-इव. पक्षी को जैसे ‘ उत्सिनाति ’ बांधता है। अर्थात्- कोई बालक या मूढ जिस प्रकार उड़ते हुये पक्षी को जालसे बांध लेता है, उसी प्रकार जो गृहस्थ पुरुष आये हुये भूखे अभ्यागत के उड़ते हुए प्राणों को अन्न से बांध लेता है ( उनके प्राणों को धारण करदेता है ) उस सुन्दर वचन वाले को सुवर्ण, हाथी, घोड़े, और लम्बी आयु इन्द्र देखता देता है, किन्तु सूखी या सार- रहित सुन्दर वाणी वाले को नही ॥ इस प्रकार यहां ‘पदि’