निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १८२ ) ५ अ० ३ पा० ७ खं० शब्द से पक्षी लिया जातां हैं, क्योंकि-वही उड़तां हुआ जाल से पकड़ा जाता है ॥ ‘मुक्षीजा’ क्यों ? मोचन से है। बाँधने से है। यां फैलाने से है ॥ 'पादु' [६४] यहँ अनवगत है । 'पद्यते.' यह अर्थ की प्रतीति है । 'पादु' (६४) यह गत्यर्थक 'पद' (दि०आ०) धातु से है। “ 'स्वः' (आदित्यः) सूर्य (भांसम्) ज्योति को 'आविः कृणुते' (आविष्कुरुते) प्रकट करता (फैलाता) है । 'बुसम्' जलको 'गूहते' खींचता है । 'अस्य' इस 'निर्णिजः' अन्धकार रूप कीचड़ से सने हुये सब जगत्के स्वरूप को अपने प्रकाश रूप जलसे धोने वाले सूर्य का 'सः' वह 'पादु'पदन (गमन तथा ताप, प्रकाश, वर्षा, उदय, अस्त, और रसका खींचना आदि ) कर्म 'न' नहीं 'मुच्यते' छूटता है।” 'बुसं' यहं जल का नाम है । शब्दार्थक 'ब्रू' (अदा०उ०) धातु से है । क्योंकि वह शब्द वाला होता है । अथवा 'भ्रंश्' पतनार्थक (दि०प०) धातु से है । क्योंकि वह मेघ से गिरता है । 'बरसतां हुआ आदित्य जिस जल को गिरांता है, उसे फिर अपनी किरणों से ले लेता है' । यह भाष्यकार ने “गूहते बुसम्” इस वाक्य का फिर स्पष्टीकरण किया है । इस प्रकार उक्त मन्त्र में 'पादु' नाम पदन यां गमन का है ॥ ७ ( १६ ) ॥ इति हिन्दी निरुक्ते पञ्चमाध्यायस्य तृतीयः पादः समाप्तः ॥ ५, ३॥