निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १८३ ) ५ अ० ४पा० २ खं० चतुर्थः पादः । ( खं० १ ) [निघ०] वृकः ॥६५॥ (निरु०) 'वृकः' चन्द्रमा भवति । विवृतज्योतिष्को वा । विकृतज्योतिष्कोवा । विक्रान्तज्योतिष्को- वा ॥ १ (२०) ॥ 'वृक' (६५) यह अनवगत और अनेकार्थ है । 'वृक' (६५) चन्द्रमा होता है । क्योंकि इस की ज्योति विवृत या फैली हुई होती है । अथवा वह विकृत या ठंडी ज्योति वाला होता है, और सब ज्योति उष्ण ( गरम ) होती हैं । अथवा वह विक्रान्त ज्योति वाला होता है, क्योंकि उसकी ज्योति अन्य ग्रह नक्षत्र और ताराओं से अधिक चमकीली होती है। (ये सब शब्द-समाधियें हैं) ॥१(२०)॥ ( खं० २ ) (निरु०) “अरुणो मासकृद्वृकः पथा यन्तं ददर्श हि। उज्जिहीते निचाय्या तष्टेव पृष्ट्यामयी वित्तं मे अस्य रोदसी ॥” ( ऋ० सं० १,७,२३,३ ) ॥ 'अरुणः' आरोचनः । 'मासकृत्' मासानां च अर्द्धमासानांच कर्त्ता भवति । “चन्द्रमाः” 'वृकः' पथा यन्तं ददर्श नक्षत्रगणम् । अभिजिहीते निचाय्य, येन येन योक्ष्यमाणो भवति चन्द्रमाः, तक्षणवद् इव पृष्टरोगी । जानीतं मे अस्य द्यावा-