भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 600

पृथिव्यौ-इति ॥ आदित्योऽपि 'वृक' उच्यते । यत्-आवृङ्क्ते ॥२॥ अर्थः- “अरुणोमासकृत्” यह कूप में पड़े हुए आप्तचात्रित ऋषि की ऋचा है । अथवा कुत्स की है । पङ्क्ति छन्द और विश्वेदेव देवता है ॥ 'अरुणः' ( आरोचनः ) अपनी चांदनी से सब जगत् को प्रकाशित करने वाला, 'मासकृत्' ( मासानांच अर्द्धमासानांच कर्त्ता भवति ) जो मासों और आधे मासों ( पखवारों ) का करने वाला है, वह 'वृकः' ( चन्द्रमाः ) चन्द्रमा (नक्षत्र-मण्डल से नीचे स्थित हुआ हुआ ) पथा' अपने मार्ग या परिधि से 'यन्तम्' ( नक्षत्रगणम् ) जाते हुये नक्षत्र समूह को 'ददर्श' ( पश्यति ) देखता है । ( 'हि' पद पूरण है । ) किन्तु मुझे अन्ध कूप में पड़े हुये को नहीं देखता । यदि कुछ भी देखता तो अवश्य इस विपद् से मुझे छुड़ाता, यह अभिप्राय है । और 'इव' जैसे कोई 'पृष्ट्यामयी' ( पृष्ठ रोगी ) पीठ में राग वाला बडही ( खाती ) 'तष्टा' ( तक्षण्वन् ) किसी वृक्ष को काटता हुआ ऊँचा होकर देखता है कि मैं वाञ्छित शाखा के पास पहुंच सकता हूं या नहीं ? उसी प्रकार चन्द्रमा भी 'निचाय्य' देख कर के 'उज्जहीते' ( अभिजिहीते ) ऊँचा होता है ( येन येन योक्ष्यमाणो भवति चन्द्रमाः ) अर्थात् जिस जिस नक्षत्र के साथ उसे योग करना होता है कि-आज मुझे इस से योग करना है, उस उस नक्षत्र के साथ उदय होता है । इस प्रकार इसको जिस से प्रयोजन होता है, उसी को आदर से ऊँचा खड़ा होकर देखता है, किन्तु मुझ से इस का प्रयोजन नहीं है, इसी से मुझे नीचे पड़े हुये को नहीं देखता । इस कारण कहता हूं-हे 'रोदसी' (द्यावापृथिव्यौ ! )