भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 601

हिन्दी निरुक्त ( १८५ ) ५ अ० ४ पा० २ खं० द्युलोकपृथ्वीलोको ! तुम दोनों ‘अस्य’ इस कूप में पड़े हुये ‘मे’ मुझ त्रित के ‘वित्तम्’ (जानीतम्) आर्त-विलाप के अभि- प्राय को जानों और जानकर मुझे इस कूप से निकालो। इस प्रकार यहां पर ‘अरुण’ शब्द से और ‘मासकृत्’ शब्द से ‘वृक’ चन्द्रमा है। यहां पर ‘चन्द्रमा’ के योग से ‘नक्षत्र गण’ ऊपर से ले लिया जाता है, जिसके द्वारा ‘पथा-यन्तम्’ की आकाङ्क्षा पूरी होती है। आदित्य भी वृक कहलाता है। क्योंकि-वह अँधेरे को वर्जन करता है ॥२॥ व्याख्या । आप्त्यत्रित ऋषि की ऐसी ही प्रार्थना पहिले भी (अ०४पा०१खं०६) “संमातपन्ति” मन्त्र में आई है। “अरुणो मासकृत्” मन्त्र में “सर्वः स्वार्थवशो लोकः” ‘सब संसार स्वार्थ के वश चलता है’ इस नीतिका स्वरूप दिखाया। तथा जैसे कालिदास के “मेघदूत” काव्य में मेघ को उद्देश्य करके यक्षने दूत योग्य बातों को कहा है, उसी प्रकार त्रित भी चन्द्रमा की ओर लक्ष्य करके द्यावा- पृथिवी से उसका उपालम्भ करता है ॥ इस मन्त्र में कोई शाखा वाले “मासकृत्” के ‘मा’ ‘सकृत्’ ऐसे दो पद करते हैं। उससे त्रित यह कहता है कि- चन्द्रमा ने मुझे एक बार ही देखा। यदि बार २ देखता तो अवश्य मुझे इस विपद् से छुड़ाता ॥२॥ २४