भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 604

हिन्दी निरुक्त (१८६) ५ अ० ४ पा० ४ खं० कि-इसने हमारी यात्रा में शुभ शब्द किया है। 'तम्' ऐसी आवाज़ देनेवाले उस 'ऋज्राश्वम्' ऋज्राश्व को 'पिता' पिता ने शापसे 'अन्धम्' अन्ध 'चकार' कर दिया कि-यह बड़ा साहसी है। 'तस्मै' उस 'विचक्षे' चक्षुरहित (अन्धे) को 'ना- सत्या' (नासत्यौ) अश्विनं 'भिषजौ' देवताओं के वैद्यों 'ने वे 'अक्षी' नेत्र 'आधत्तम्' दिये जो 'अनर्वन्' (अन्यत्र अनाश्रिते) दूसरी जगह नहीं थे। इस प्रकार यहो मेष (मीढे) के सम्बन्ध से और व्याख्यान में अर्थ के घट जाने से 'वृकी' से गीदड़ी कही गई निश्चित होती है। इस मन्त्र में यात्रा के समय गीदड़ी के शब्द को शुभ शकुन बताकर शकुन शास्त्र को प्रमाणित कर दिया है। और अनुचित उदारता की निन्दा की गई है। एवम् पुत्र पर पिता के शासन के अधिकार की सूचना भी मिलती है॥ 'जोषवाकम्' (६६) यह अनवगत है। 'अविज्ञातनामधेय' (नहीं जाने हुए का नाम) यह अर्थ-कथन है।— 'जोषवाक' (६६) यह अविज्ञात का नाम है। क्योंकि वह सेवन योग्य या प्रकाशनयोग्य होता है। जो किसी से न जाने जावें, ऐसे विषय-सेवन में प्रिय होते हैं। अथवा जो अज्ञात (नहीं जाना हुआ) है, उसी का प्रकाश भी किया जाता है॥ ३ (२६) ॥ (खं० ४) [निघ०] कृत्तिः ॥६७॥ श्वघ्नी ॥६८॥ समस्य ॥६६॥ (निरु०) "य इन्द्राग्नी सुतेषु वां स्तवत्तेष्वृधता वृधा ।