निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १६५ ) ५ अ० ४पा० ६ खं० इमें 'आशिशीहि' वाञ्छित दे । यहां 'समस्मिन्' सप्तमी में है । 'शिशीति' धातु दानार्थक है । “ उरुष्याणो ” अर्थात्—'नः' हमें'उरुष्य' पास आकर 'समस्मात्' सब 'अघायतः' पाप चाहने वाले से रक्षा कर । यहां ' समस्मात् ' यह पञ्चमी में है । ' उरुष्यति ' धातु अकर्मक है । और प्रथमो विभक्ति के बहुवचन में भी है— “ नभन्तामन्यके समे ” अर्थात्-और सब नहीं यहां 'समे' यह प्रथमा के बहुवचन का रूप है । ( निरु० अ० १० पा० १ खंड ५ ) ५ ( २३ ) ॥ ( खं० ६ ) [निघ०-] कुटस्य ॥७०॥ चर्षणिः॥७१॥ शंबः ॥ ७२ ॥ केपयः ॥ ७३ ॥ (निरु०-) “हविषा जारो अपां पिपर्त्ति पपुरिर्नरा ॥ पिता कुटस्य चर्षणिः ॥ ” ( ऋ० सं०१,३,३३,४ ) हविषा अपां जरयिता ॥ 'पिपर्त्ति' 'पपुरिः'-इति पृणातिनिगमो वा प्रीणातिनिगमो वा । पिताकृतस्य कर्मणः चायिता आदित्यः ॥ ‘ शम्ब ’ इति वज्रनाम । शमयते र्वा । शात- यते र्वा ॥ “ उग्रोयः शम्बः पुरुहूततेन ” ( ऋ०सं०७,८,