भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 613

हिन्दी निरुक्त ( १९७ ) ५ अ० ४ पा० ७ खं० 'शम्ब' (७२) यह वज्र का नाम है । शमयति धातु का अथवा शातयति धातु का है । (क्यों कि वह जिस पर छोड़ा जाता है, उसका शमन कर देता है, या शातन (छेदन) कर देता है) । 'हे 'पुरुहूत' बहुतों से आवाहन किये जाने वाले! 'उग्रः' कठोर 'यः' जो 'शम्बः' वज्र है, 'तेन' उस से (शत्रुओं को मार ) यह भी निगम है । यहां मारने के सम्बन्ध से 'शम्ब' नाम वज्र का सिद्ध होता है । यह वज्र के नामों में पढ़ा हुआ नहीं है, इस से यह अप्रसिद्ध अर्थ वाला है, उस की इस प्रकार प्रकरण से अर्थ सिद्धि होती है । 'केपयः' (७३) यह अनवगत है । 'कपूय' (बुरे कर्म) होते हुए 'केपि' कहे जाते हैं । - 'केपि' कपूय होते हैं । 'कपूय' क्या ? इस में 'पुनाति' ( क्रया० उ० ) धातु की क्रिया (पवित्र करना ) है । वह क्या ? कुत्सित । क्यों ? वह दुष्पूय (धोना कठिन ) होता है अथवा जो कोई पाप करने वाला प्रायश्चित्त करके कुत्सित (बुरे) कर्म को धोता है, वह कपूय होता है । वही केपि है । ॥ ६ ( २४ ) ॥ ( खं० ७ ) (निघ०) तृतुमाकृषे॥७४॥ असतम्॥७५॥ (निरु०) “पृथक्प्रायन्प्रथमा देवहूतयोऽकृण्वत श्रव- स्यानिनुष्टरा । नये शेकुर्यज्ञियां नावमारुहर्ममैव न्तेप्रविशन्तकेपयः ॥” [ऋ० सं० ७,८,२७,१] ॥