निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १६६ ) ५ अ० ४ पा० ७ खं० औरों को कठिनता से अनुकरण करने योग्य हैं, 'अकुर्वत' ( अकुर्वत ) कर गये हैं । कौन ? 'ये' जो 'यज्ञियाम्' यज्ञकी 'नावम्' नावको 'आरुहम्' (आरोढुम्) चढ़ने में शेकुः' (अश- क्नुवन्) समर्थ हुये । ( अथ ) और 'ये' जो 'यज्ञियां नावम्- आरोढुम् न शेकुः (अशक्नुवन्)' यज्ञ की नाव पर (तेरे प्रसाद के बिना या विषयों में आसक्त होने के कारण) चढ न सके, “ईर्म-एव ते (केपयः) न्यविशन्त” ( इह एव ते (कपूयाः) न्यविशन्त ) उन दुराचारियों ने इसी में वास (प्रवेश) किया है, अर्थात् 'ते' वे (ऋणो हैव न्यविशन्त) तेरे ऋण में (ऋणी) ही रहे। या (इहैवान्तीके) इसी लोक में रहे, किन्तु तेरे दिव्यलोक में न जा सके। 'ईर्म' यह बाहु का नाम है । क्यों कि-वह समीरितातर या अन्य अङ्गों की अपेक्षा कर्मों में बहुत अधिक प्रेरित होता है ॥ यह शब्द की समानरूपता के कारण दूसरा अर्थ कहा गया है ॥ ऊपरके मन्त्रमें दिखाया कि-दिव्य लोकोंकी प्राप्ति यज्ञ से होती है और यज्ञ न करने वाले इस लोक में कूकूर शूकर होकर पड़े रहते हैं। इसी में लोकान्तर और उनकी उत्तम कर्म से प्राप्ति भी कही गई होती है । 'तूतुम्'-'आकृषे' (७४) ये दो अनवगत पद है। 'तूतुम्' की 'तूर्णम्' और 'आकृषे' की 'उपाकुरुषे' शब्द-समधि है। “एताविश्वा सवना तूतुमाकृषे स्वयं सूनो ! सहसो यानि दधिषे । वराय ते पात्रं धर्मणे तना यज्जो मन्त्रो ब्रह्मोद्यतं वचः । [ऋ० सं० ८, १, ९, ६]