भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 617

हिन्दी निरुक्त ( ३०१ ) ५ अ० ४ पा० ८ खं० 'अंसत्रम्' (७५) यह अनवगत है । विकल्प से अनेकार्थ है । "अंहसः त्राणम्” ( पाप से रक्षा करने वाला ) यह शब्द समाधि है । “धनुर्वा कवचं वा” (धनुष अथवा कवच) यह अर्थ-कथन है । क्यों कि-उन दोनों से योद्धा साम्ग्रामिक (सग्राम के) अंहस् (कष्ट) मे अपनी रक्षा करते हैं । अंसत्र ( ७५ ) क्या ? अंहस् ( कष्ट) से त्राण ( रक्षा ) करने का साधन । वह क्या ? अथवा धनुष् अथवा कवच । 'कवच' क्यों ? वह 'कु' (कुटिल) 'अञ्चित' (खिँचा हुआ) रहता है, अथवा कुछ कुटिल खिंचा हुआ रहता है । अथवा शरीर में अञ्चित पूजित या गया हुआ होता है ॥ ७ (२५) ॥ ( खं० ८ ) (निघ०-) काकुदम् ॥ ७६ ॥ (निरु०-) “प्रीणीताश्वान्हितं जयाथ स्वस्तिवाहं रथमित्कृणुध्वम् । द्रोणाहावमवत मश्मचक्र मंसत्र कोशंसिञ्चता नृपाणम् ॥” ( ऋ० सं० ८, ५, १९, १ ] प्रीणीत अश्वान् सुहितं जयथ, जयनं वो हितमस्तु, स्वस्तिवाहनं रथं कुरुध्वं, द्रोणाहावम् । 'द्रोणं' द्रुममयं भवति । 'आहावः' आहानात् । 'आवहः' आवहनात् 'अवतः' अवातितो महान् भवति । 'अश्मचक्रम्' अशनचक्रम् । असनचक्रमितिवा । 'अंसत्रकोशम्' "अंसत्राणि" वः कोशस्थानीयानि सन्तु । 'कोशः' कुष्णातेः । विकुषितो भवति ॥