निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २०२ ) ५ अ० ४ पा० ६ खंड अयमपि इतरः कोशः एतस्मादेव । संचयः । आचितमात्रो महान् भवति । सिञ्चत नृपाणम् । नरपाणं कूपकर्मणा संग्राममुपमिमीते ॥ 'काकुदं' तालु इत्याचक्षते । जिह्वा 'कोकुवा' सा अस्मिन् धीयते । 'जिह्वा' कोकुवा । कोकूय- माना वर्णान्नुदति-इति वा। कौकूयते वा स्यात् शब्दकर्मणः । 'जिह्वा' जोहुवा । 'तालु' तरतेः । तीर्णतमम् अङ्गम्। लनते र्वा स्यात् लम्बकर्मणो विपरीतात्, यथा 'तलं'। 'लता'-इति-अविपर्ययः ॥ ६ (२६) ॥ “प्रीणीताश्वान्” ऋचा का सोम का पुत्र बुध ऋषि है। विश्वेदेव देवता है।- अर्थः- (हे विश्वेदेवाः !) सब देवताओं ! 'अश्वान्' इन अपने घोड़ों को 'प्रीणीत' घास दाणा आदि से तृप्त करो प्रयोजन यह कि-'यह संग्राम उपस्थित है। इन अश्वों को पुष्ट तथा बलयुक्त करके इनसे 'हितम्' (सुहितम्) सुन्दर हित रूप 'जयथ' (जयथ) जय प्राप्त करो । 'हित' विशेषण से प्रयोजन यह है कि-कोई अहित जय भी होता है,जिसमें कि- सुहृदों (मित्रों) भाइयों और पुत्र आदिकों का वध हो जैसा कि-कौरव पाण्डवों का महाभारत में हुआ । अर्थात्-(जयनं वः हितम् अस्तु) तुम्हारा जय हित हो । 'स्वस्तिवाहम्' (स्वस्ति- वाहनम्) बड़े उत्तम घोड़ों वाला 'रथम्' रथको 'कृणुध्वम्'