भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 619

हिन्दी निरुक्त ( ३०३ ) पृ० ४ पा० ८ खं० ( कुरुध्वम् ) करो । 'द्रोणावहम्' ( द्रोणं द्रुमयं भवति ) द्रोण यं काठके बने हुए इस रथको 'आवह' युद्ध के योग्य बनाकर 'अवतम्' इस संग्राम रूप कूप को 'अंसत्र कोशम्' अंसत्र नाम धनुषों का अथवा कवचों का कोश ( खजाना ) हो, ऐसे 'सिञ्चत' सींचो । जो संग्राम कूप 'नरपाणम्' नर-पाण है, या जिस में नर ( मनुष्य ) ही जलके समान भरे आते हैं, जो 'अश्म चक्रम्' अश्मचक्र है, या जिसमें चक्र व्याप्त रहते हैं, अथवा फेंके जाते हैं ॥ 'आवह' (युद्ध) आवाहनसे है । क्योंकि-उसमें एक योद्धा प्रतियोद्धा को आवाहन करता है । 'आवह' ( वाहन ) आव- हन ( ले चलने ) से है, क्योंकि-वह अपने स्वामी को अपने ऊपर चढाकर स्थानान्तर में ले जाता है । 'अवत' ( कूप ) क्यों ? वह 'अवातित' या खोदा जाता हुआ (अव) नीचे को ही ( अतित ) गया हुआ महान् होता है । 'अश्मचक्र (युद्ध) क्यों ? वह अशनचक्र होता है, या उस में फेंके हुए अस्त्र व्याप्त रहते हैं । अथवा वह असन चक्र होता है, या उसमें चक्र फेंके जाते हैं । प्रायः 'अश्मचक्र' यह अवत (कूप) का विशेषण भी हो सकता है । क्योंकि-वह अश्म ( पत्थर ) का चक्र (गोल) जैसा बना हुआ होता है । 'अंसत्र- कोशम्' अंसत्र (धनुष् या कवच) तुम्हारे कोश के स्थान में हों । 'कोश' (म्यान) कोषणा ( गोदने ) अर्थ में 'कुष' ( क्रया० प० ) धातुसे है । क्योंकि-वह अनेक प्रकार से गुदाहुआ होता है । चर्म का सिला हुआ होता है ॥ यह भी दूसरा कोश ( द्रव्य का घर ) इसी 'कुष्' धातु से है । वह 'संचय'-या महान् ( बड़ा ) 'आचित मात्र' ( जिसमें