भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 620, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 620

हिन्दी निरुक्त ( १०४ ) ५ अ० ४ पा० ६ खं० मात्राएँ आश्रित ( भरी हुईं ) हों ) होता है । ऋचाके उत्तरार्द्ध में कूप ( कूएं ) के कर्म से संग्राम को उपमा देता है ॥ 'काकुद्' (७६) यह अनवगत है । 'काकुद्' को तालु (तालुवा) ऐसा कहते हैं। वह 'काकुद्' क्यों है ? कोकुवा जिह्वा होती है, वह इसमें धारण की जाती है । जिह्वा 'कोकुवा' क्यों कहलाती है ? वह कोकूयमान ( कू- कती हुई ) वर्णों (अक्षरों) को प्रेरित करती है । अथवा शब्द अर्थ में 'कु' ( यङन्त ) धातु से है । 'जिह्वा' क्यों ? वह जोहुवा है, या उससे प्राणी आत्मा में अन्न का होम करते हैं । अथवा उससे दूसरे को आवाहन करते हैं । इस से वह जिह्वा है । 'तालु' कैसे ? 'तृ' ( भ्वा० प० ) धातु से है । क्यों कि- वह अन्य अङ्गोंसे विस्तृत होता है । अथवा लम्बन (लटकने) अर्थ में 'लत' (भ्वा० प०) धातुके विपरीत (उलटे) रूप से है । जैसे 'तल' शब्द । 'लता' शब्द उसी 'लत' धातु के सीधे रूप से होता है ॥ ८ ( २६ ) ॥ ( खं० ६ ) [निघ०-] वीरिंटं ॥ ७७ ॥ (निरु०) " सुदेवो असि वरुण यस्य ते सप्त सिन्धवः । अनुक्षरन्ति काकुदं सूम्यं सुषिरामिव ॥" ( ऋ० सं० ६, ५, ७, २) सुदेवः त्वं कल्याणदानः, यस्य तव देव सप्त सि-

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