भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 626

हिन्दी निरुक्त ( २१० ) ५ अ० ४ पा० १० खं० 'परि' (७६) 'ईम्' (८०) 'सीम्' (८१) ये प्रथम अध्याय में निपात और उपसर्गों के प्रकरण में व्याख्यान किये जा चुके हैं। ('परि' १, १, ५, 'ईम्' १, ३, ५, 'सीम्' १, ३, २) 'एनम्' ( ८२ ) 'एनाम्' ( ८३ ) ये दोनों पद 'अस्याः' 'अस्य' इन दोनों पदों से चतुर्थ अध्याय में (४, ४, ४) व्या- ख्यान किये जा चुके हैं । 'सृणिः' (८४) यह अङ्कुश का नाम है । क्योंकि-वह हाथी के शिर पर सरण (गमन) करता है । 'अङ्कुश' शब्द कैसे ? 'अञ्च' ( भ्वा०प० ) धातु से हैं। अथवा आकुंचित या मुड़ा हुआ होता है । अतः आकुंचित होता हुआ 'अङ्कुश' होता है । “नेदीय इत्सृण्यः पक्वमेयात्” (य०वा०सं०१२,६८) हे कर्षको ! 'सृण्यः' सृणि (अङ्कुश) जितनी दूरी पर टिक कर सस्य को खींच सकता है, उससे 'इत्' भी 'नेदीयः' (अन्तिक- तमम्) बहुत निकट पक्व (पकी हुई) औषधि 'एयात्' हमारे प्रति आवे । ऐसा गहरा बोओ ॥ कोई कहते हैं, हे कर्षको ! ऐसे बीज बोओ, जैसे-दात्र (दरांत) के द्वारा खींचने से पहिले हमारी मुट्ठी सस्य (धान्य) से भरजावे इस पक्ष में अङ्कुश नाम दात्र का ही है । उस से खींचे हुए सस्य के 'अङ्कुशादायात्' दात्र से खींचने से पहिले 'नेदीयः' (अन्तिकतमम्) बहुत निकट हुआ हुआ 'पक्वम्' पका हुआ 'औषधम्' औषध 'आगच्छतु' आवे 'आगच्छतु' आवे । अध्याय की समाप्ति दिखाने के अर्थ 'आगच्छतु' पद को दो बार पढ़ा है ॥ इस प्रकार यहां 'नेदीयः' शब्द के सम्बन्ध से 'सृणि' अङ्कुश अथवा दात्र ( दरांत ) है ॥ इति हिन्दीनिरुक्ते पञ्चमाध्यायस्य चतुर्थः पादः