भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 625

हिन्दी निरुक्त ( २०६ ) ५ अ० ४ पा० १० खं० षाम् ) मनुष्यों के हर एक क्रियामें बुलाये हुये 'अक्तोः' (रात्र्याः) ( विवासे अपगमे ) रात्रिके बीत जाने पर 'उषसः' 'च' ( आ- गमनकाले ) और उषा के आगमन काल में 'पूर्वहूत्तौ' ( पूर्व- स्यामेव अभिहूतौ ) पहिले ही बुलावे में 'नियुत्वान्' नियुत् घोड़ों वाला 'वायुः' वायु 'पूषा' (च) और पूषा दोनों 'स्वस्तये' यजमान के कल्याण के लिये 'एयाते' आते हैं ॥ क्योंकि-देवता अन्तरिक्ष से ही आते हैं इस कारण 'बीरिट' नाम आकाश का ही हो सकता है । और जिस पक्ष में 'बीरिट' नाम गण ( समूह ) का है, उस पक्ष में भी राजा लोग गण के मध्य में हो कर ही चलते हैं, यह उपपन्न होता है । निरुक्तार्थः-इन देवताओं के अच्छे आगमन योग्य कुशा बिछाई जाती है आते हैं, सबके पाता या पालयिता (पालन करने वाले ) । ( धातु दो हैं, और अर्थ एक है ) । 'बीरिट' नाम अन्तरिक्ष का है । क्यों कि-उस में भय का विस्तार है, या ज्योति ( ताराग्रह आदि ) का विस्तार है । अथवा 'इव' उपमा अर्थ में है । सब के पतियों जैसे राजा, बीरिट नाम मनुष्यों के समूह में ( अवस्थित ) । रात्रि के चले जाने पर पहिली अभिहूति ( बुलावे ) में नियुत्वान् वायु और पूषा स्व- स्त्ययन ( कल्याण ) के लिये ॥ 'नियुत्वान्' क्यों ? नियुत् इसके घोड़े हैं । 'नियुत्' क्यों? नियमन (शासन किये जाने) से । अथवा नियोजन (जोड़ने) से । 'अच्छ' (९८) शब्द 'अभि' (अव्यय) शब्द से है, या उस के अर्थमें है । शाकपूणि आचार्य कहते हैं कि-'आप्तुम्' (प्राप्त होने को ) पद के अर्थ में है । २७