भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 624

हिन्दी निरुक्त (२०८) ५ अ० ४ पा० १० खं० 'परि' 'ईम्' 'सीम्'-इति व्याख्याताः ॥ 'एनम्' 'एनाम्' "अस्याः-अस्य"-इत्येतेन व्याख्यातम् ॥ 'सृणिः' अङ्कुशो भवति । सरणात् ॥ 'अङ्कुशः' अञ्चतेः । आकुञ्चितो भवति- इति वा ॥ "नेदीय इत्सृण्यः पक्वमेयात्" (य० वा० सं० १२, ६८,) । इत्यपि निगमो भवति ॥ 'अन्तिकतमम्-अङ्कुशादायात् पक्वम्-औषधम् आगच्छतु'-इति आगच्छतु-इति ॥ इति पञ्चमाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥ ५, ४ ॥ "प्रवावृजे" इस ऋचा का वसिष्ठ ऋषि और त्रिष्टुप् छन्द है । - 'सुप्रयाः' (सुप्रयाणम्) जिसपर अच्छे प्रकार देवता आसकते हों, ऐसे भले प्रकार 'बर्हिः' कुशा (डाभ) 'प्रवावृजे' (प्रवृज्यते) बिछाई जाती है । 'विशपती' सर्वस्य जगतःपती) सब जगत् के स्वामी 'आ-इयाते' (आगच्छतः) आते हैं । कहां फिर अवस्थित होकर आते हैं ? 'बीरिंटे' (अन्तरिक्षे) आकाश में । 'इव' (पाद पूरण है ।) । अथवा 'बीरिंटे' (गणे मनुष्याणाम् ) मनुष्योंके समूह में अवस्थित हुए हुए 'विशपति' सब के पति राजाओं के 'इव' समान 'आ-इयाते' आते हैं । किसके यहां आते हैं ? किस काल में आते हैं ? कौन आते हैं किस प्रयोजन से आते हैं ? 'एषाम्' इन 'विशाम्' (मनुष्या-