निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ
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हिन्दी निरुक्त ( २६४ ) ६ अ० २ पा० ३ खं०
उदकम् अपि 'पाथः' उच्यते। पानात्।
"आचष्ट आसां पाथो नदीनाम्।" (ऋ०सं०
५, ३, २५,९-१०) इत्यपि निगमो भवति॥
अन्नम्-अपि 'पाथः' उच्यते। पानादेव।
"देवानां पाथ उपवक्षि विद्वान्।" (ऋ०सं०
६, २, २२, ५) इत्यपि निगमो भवति॥
'सवीमनि' प्रसवे।
"देवस्य वयं सवितुः सवीमनि।" (ऋ०सं०
५, १, १५, २) इत्यपि निगमो भवति॥
'सप्रथाः' सर्वतः पृथुः।
"त्वमग्ने सप्रथा असि।" (ऋ० सं० ४, १,
५, ४) इत्यपि निगमो भवति॥
'विदथानि' वेदनानि।
"विदथानि प्रचोदयन्।" (ऋ० सं० ३, १,
२९, २) इत्यपि निगमो भवति॥ ३ (७)॥
'अस्मे' (२६) यह पद सर्वविभक्त्यन्त है, इसीसे अनेकार्थ है। अर्थात्
एक ही 'अस्मे' यह शब्दरूप सातों विभक्तियों के अर्थ में रहता है, प्रकरण
के अनुसार उसका नियम होता है, जैसे कि-पहिले प्रथमा विभक्ति में उदा-
हरण है—
"अस्मे ते बन्धुः" 'अस्मे' (वयम्) हम 'ते' तेरे
(बन्धुः) बन्धु हैं। यह अर्थ है।
(२ या०) "अस्मे यातं नासत्या सजोषाः"