निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(७ मी) “अस्मे धत्त वसवो वसूनि” हे 'वसवः' वसुओ ! 'अस्मे' (अस्मासु) हम में 'वसूनि' (धनानि) धनों को 'धत्त' तुम धारण करो ॥ यहां धारण क्रिया के संबन्ध से 'अस्मे' यह (अस्मासु) हममें इसके अर्थ में अधिकरण कारक में सप्तमी है ॥ 'पाथः' ( अनवगत और अनेकार्थ ) अन्तरिक्ष (आकाश) होता है । इसकी 'पथिन्' (पन्थाः) के समान व्याख्या है । “श्येनो न दीयन्नन्वेति पाथः” अर्थात्-सूर्यदेव 'श्येनः-इव' बाज के समान 'दीयन्' ( गच्छन् ) गमन करता हुआ 'पाथः' अन्तरिक्ष ( आकाश ) में 'अन्वेति' देवनिर्मित मार्ग से जाता है । यह भी निगम है । यहां सूर्य के वर्णन के सम्बन्ध से 'पाथः' अन्तरिक्ष है । उदक (जल) भी 'पाथस्' (पाथः) कहा जाता है । क्यों ? पान से । अर्थात् वह पीया जाता है, इससे 'पाथस्' है । “आचष्ट आसां पाथो नदीनाम्” अर्थात्-(वरुणः) वरुण देव 'आसाम्' इन 'नदीनाम्' नदियों के 'पाथः' जलको 'आचष्टे' ( कथयति-इव ) कहता जैसा है । यह भी निगम है ॥ यहां नदियों के संबन्ध से 'पाथः' जल है । अन्न भी 'पाथः' कहा जाता है। क्यों ? पानसे । अर्थात् वह भी प्राणधारणा के लिये पीया जाता है । “देवानां पाथ उपवक्षि विद्वान्” अर्थात्-हे (वन- स्पते !) वनस्पति देव ! 'विद्वान्' अपने अधिकार को जानने वाला (त्वम्) तू 'देवानाम्' देवताओं को 'पाथः' हविः-रूप अन्न 'उपवक्षि' पहुंचाता है । यह भी निगम है । यहां देव-