निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त (२५७) ६ अ० २ पा० ४ खं० ताओं के पास पहुंचाने के संबन्ध से 'पाथः' अन्न है ॥ 'सवीमनि' ( ३१ ) शब्द 'प्रसवे' ( आज्ञा में ) के अर्थ में है । “देवस्य वयं सवितुः सवीमनि” अर्थात्-'वयम्' हम 'सवितुः' सूर्य 'देवस्य' देव के 'सवीमनि (प्रसवे) आज्ञा में (रहते हैं) । यह भी निगम है। यहां सूर्य देवके सम्बन्ध से 'सवीमनि' 'प्रसवे' (आज्ञामें) के अर्थ में है ॥ 'सप्रथाः' ( ३२ ) क्या ? 'सर्वतः पृथुः' सब ओर मोटा । “त्वमग्ने सप्रथा असि” 'अग्ने' हे अग्निदेव ! (त्वम्) तू 'सप्रथाः' सब ओर से मोटा 'असि' है ॥ यहां शब्द की समानता और अर्थ के घटनेसे 'सप्रथाः' 'सर्वतःपृथुः' के अर्थ में है ॥ 'विदथानि' ( ३३ ) पद 'वेदनानि' (विज्ञान) के अर्थ में है । “विदथानि प्रचोदयन्” विज्ञानां को अनुग्रह करता हुआ' । यह भी निगम है। क्योंकि-अग्नि देव के प्रकाश से ही सब विज्ञान (प्रत्यक्षज्ञान) अनुगृहीत होते हैं, इससे यहां 'विदथ' नाम विज्ञान का है ॥ ३ (७) ॥ ( खं० ४ ) निघ०-श्रायन्तः ॥३४॥ आशीः ॥३५॥ निरु०-“श्रायन्त इव सूर्य्यं विश्वेदिन्द्रस्य भक्षत। वसूनि जाते जनमान ओजसा प्रतिभागं न दीधिम ॥” (ऋ० सं० ६, ७, ३, ३] ३३