भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 672

समाश्रिताः सूर्य मुपतिष्ठन्ते । अपिवा उपमार्थे स्यात्। सूर्यमिवइन्द्रम्-उपति- ष्ठन्ते-इति । सर्वाणि इन्द्रस्य धनानि विभक्षमा- णाः । सयथा धनानि विभजति, जाते च जनिष्य- माणे च । तं वयं भागम्-अनुध्यायाम ओजसो बलेन । 'ओजः' ओजतेर्वा । उब्जतेर्वा ॥ 'आशीः' आश्रयणाद् वा । आश्रपणाद् वा ॥ अथ-इयम्-इतरा 'आशीः' आशास्तेः ॥ “ इन्द्राय गाव आशिरम् ” (ऋ० सं० ६, ५, ६, १) इत्यपि निगमो भवति ॥ “सामे सत्याशीर्देवेषु” इति च ॥ ४ ॥ 'आयन्तः' ३४) मन्त्रगत 'समाश्रिताः' (किसी में रहे हुए) के अर्थ में है । अर्थः-“श्रायन्तइव” इस ऋचाका बृहती छन्द है सुमेध आङ्गिरस ऋषि है । महाव्रतमें बृहती सहस्त्रमें विनियोग है । प्रथम पक्षमें-'इव' (अनर्थक है ) (रश्मयः) रश्मिएं 'आ- यन्तः' (समाश्रिताः) सब प्रकार आश्रित हुये हुये 'सूर्यम्' सूर्य की ( उपतिष्ठन्ते ) उपस्थान करते हैं । (अपिवा) दूसरे पक्ष में 'इव' उपमा अर्थ में है । अर्थात्-'सूर्यम्-इव' सूर्य को जैसे, ( इन्द्रम् उपतिष्ठन्ते ) इन्द्र को उपस्थान करते हैं । कैसे ? “विश्वेदिन्द्रस्य भक्षत” 'इत्' (अनर्थक) सूर्य के 'विश्वा' (विश्वानि) सब 'वसूनि' धनों को ' इन्द्रस्य' इन्द्रकी 'भक्षत'