निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २३६ ) ६ अ० २ पा० ४ खं० (विभज्यमानाः) बांटने की इच्छा करते हुये । [ रश्मियें जिस प्रकार प्रति दिन सूर्य को उपस्थान करते हैं, उसी प्रकार मध्यै लोक में रहने वाले जल के स्वामी इन्द्र को भी उपस्थान करते हैं । ] और (सः-यथा) सो आदित्य अथवा इन्द्र जिस प्रकार 'जाते' उत्पन्न हुये प्राणिमात्र में 'जनमाने' (जनिष्यमाणे) (च) और उत्पन्न होने वाले प्राणिमात्र में 'वसूनि' (धनानि) धनों को 'ओजसा' (बलेन) अपने ऐश्वर्य बलसे (विभजति) बांटता है, उसी प्रकार बांटे हुये (तं) उस 'भागम्' 'प्रति' भागको हम 'न' (अनर्थक०) दीधिय' (अनुध्यायाम ) अनुचिन्तन करते (चाहते) रहते हैं । [ अर्थात्-हम इन्द्र देव के दिये हुए धना- दि को भोगना चाहते हैं, किन्तु अन्याय से मिले हुये को नहीं । ] यहां पर 'आयन्त इव सूर्यम्' ( सूर्य को आश्रित होते हुये ) इस प्रकार सूर्य के संबन्ध से पहिले रश्मियों का अध्या- हार होता है, और फिर रश्मि के संबन्ध से 'आयन्तः' यह पद 'समाश्रिताः' के अर्थ में प्रतीत होता है । 'ओजः' (बल) वृद्धि अर्थ में 'उज' (चु० औ० पै०) धातु से अथवा न्यग्भाव ( नीचा करना ) अर्थ में 'उब्ज' (तु०प० ) धातुसे है । [क्योंकि-वह बढ़ाया जाता है, या उससे शत्रु नीचा किया जाता है । ] 'आशीः' (३५) यह अनवगत और अनेकार्थ है । 'आशिर' (दधि) यह अर्थ की प्रतीति है ।- 'आशीः' (३५) (आशिर = दधि) क्यों ? 'आश्रयणाद्वा' अथवा आश्रयण से । क्योंकि-वह यजमान को व्रतधुक् नाम गोसे दोहा जाता है, और फिर सोम में आश्रित किया (रखा) जाता है। इसीसे वह आश्रित होता हुआ 'आशीः' कहा जाता है । 'आश्रपणाद् वा' अथवा आश्रपण ( पकाया जाने ) से ।