निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्योंकि-वह दही बनाने के अर्थ कुछ पकाया जाता है। और यह दूसरी (लौकिक) 'आशीः' (प्रार्थना = आ- शीर्वाद) आ (ङ्) उपसर्ग 'शास्' (अदा०प०) धातु से है। “इन्द्राय गाव आशिरं (दुदुह्रे) ” अर्थात्-‘इन्द्राय इन्द्रके अर्थ ‘गावः' गोओने ‘आशिरम्' आशिर नामक (प्रयो- जन वाला) दूध दुहा। यह भी निगम है। और- “सामे सत्याशीर्देवेषु ” अर्थात्-‘'सा' वह 'मे'मेरी 'सत्या' सच्ची 'आशीः' प्रार्थना 'देवान्' (गम्यात्) देवताओं के प्रति जावे।' यह भी है। यहां पर आशिषा (प्रार्थना) ही 'आशीः' शब्द से कही जाती है, क्योंकि उसका देवताओं के प्रति जाना अभीष्ट है ॥ ४ ॥ ( खं० ५ ) निघ०- अजीगः ॥ ३६॥ अमूरः ॥३७॥ शशमानः ॥ ३८ देवोदेवाच्या कृपा ॥३९ निरु०- “यदा ते मर्त्तो अनुभोगमानलादिद् ग्रसिष्ठ ओषधीरजीगः” (ऋ० सं० २,३, १२, २) यदा ते मर्त्तो भोगमन्वापद्-अथ ग्रसितृतम ओषधीरगारीः । ‘जिगर्त्तिः’ गिरतिकर्मावा गृणातिकर्मा वा । गृह्णातिकर्मा वा ॥ “मूरा अमूर न वयश्चिकित्वो महित्वमग्ने त्वमङ्ग