निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २६१ ) ६ अ० २ पा० ५ खं० वित्से । ” ( ऋ० सं० ७, ५,३२, ४) । मूढा वयं स्मः, अमूढस्त्वमसि, न वयं विद्मो महत्त्वमग्ने त्वं तु वेत्थ ॥ ‘शशमानः’ शंसमानः । “यो वां यज्जैः शशमानो ह दाशति” (ऋ०सं० १, २, २१, २) । इत्यपि निगमो भवति । ‘देवो देवान्त्या कृपा’ । देवो देवान् प्रति-अक्तया कृपा कृप् कृपतेर्वा । कल्पते र्वा ॥ ५ (८) ॥ ‘अजीगः’ (३६ ( अनवगत) ‘अगारी’ ( निगलता है) के अर्थ में है।- “ यदाते ०-० ” अर्थात्- हे अश्व ! ‘ यदा ’ जब ‘मर्त्तः’ ( मनुष्यः ) मनुष्य ‘ते’ तेरे ‘भोगम्’ भोगको ‘अनु- आनट् ’ ( अन्वापत् ) प्राप्त होता है (तुझे चढ़कर वाहता है) ‘आदित्’ (अथ) फिर तू थका हुआ भी ( ग्रसितृतमः ) बहु- भोजन-शील ‘ ओषधीः ’ ‘अगारीः : ’ ओषधियों ( घास ) को ग्रहण करता अथवा खाता ही है। अर्थात्-और पशु थके हुए चर नहीं सकते और तू बहुत अच्छे प्रकार ओषधियों को खाता है, यह तेरा अधिक सामर्थ्य है। इस प्रकार यहां ओषधि और अश्वके संबन्धसे ‘जिगत्ति’ धातु ‘गिरति’ धातु के अर्थ (निगलने ) में अथवा ‘गृह्णाति’ धातुके अर्थ (ग्रहण) में है, यह सिद्ध होता है। ‘अमूर’ ( ३७ ) शब्द ( अनवगत ) ‘अमूढ’ ( नहीं मूढ ) के अर्थ में है।- “मूरा वयम्० ०” अर्थात्- हे भगवन् अग्निदेव !