भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 676

हिन्दी निरुक्त ( २६२ ) ६ अ० २ पा० ६ खं० 'अमूर' ! अमूढ ! 'वयम्' हम 'मूराः' ( मूढाः-स्म ) मूढे हैं । 'महित्वम्' (महत्वम्) तेरी महिमा को 'न-चिकित्वः' (न-वि- जानीमः) नहीं जानते हैं। हे 'अग्ने !' 'त्वम्-अङ्ग' (त्वं) किन्तु तू 'वित्से' (वेत्थ) जानता है ॥ यहां पर 'मूढाः' पदसे अपनी निन्दा के द्वारा 'अमूढः' पद से अग्नि की स्तुति की गई है, इससे 'अमूर' शब्दका 'अमूढ' शब्द ही बदला हो सकता है। 'शशमानः' (३८) शब्द ( अनवगत ) 'शंसमानः' ( स्तुति करता हुआ ) के अर्थ में है।— “यो वां य॒ज्ञैः शश॑मानो॒ हं दाशा॑ति” अर्थात्- 'यः' जो यजमाने 'वाम्' ( युवाम् ) तुम दोनों को 'यज्ञैः' यज्ञों से 'शशमानः' (शंसमानः') स्तुति करता हुआ 'दाशति' (ददाति) हवियों कोदेता है। यह भी निगम होता है। इस प्रकार यहां यज्ञ के सम्बन्ध और शब्द की समानता से 'शश- मानः' यह पद 'शंसमानः' के अर्थ में है यह सिद्ध होता है। 'देवो देवाच्या कृपा' (३६) ये दो शब्द अनवगत हैं। 'देव' शब्द इन्हीं दोनों शब्दों के मन्त्रविशेष में पहिचान कराने के अर्थ है। देवः, देवाच्या, कृपा, ये तीन पद है। 'देवाच्या'पद की 'देवान्प्रति-अञ्चितया' (देव- ताओं के प्रति गई हुई से) यह अर्थ-प्रतीति है। 'कृपा' इसकी भी 'कल्पितया' ( कल्पित की हुई से ) अर्थ-प्रतीत है— “देवो देवाच्या कृपा” अर्थात्-“ 'देवः' देव 'देवांच्या' ( देवान्प्रति-अक्तया ) देवताओं के प्रति गई हुई, 'कृपा' कल्पित की हुई से' । 'कृप्' शब्द कृपार्थक 'कृप् ( तुं० प० )' धातु से है। अथवा सामर्थ्य अर्थ में कृप् ( स्वा० आ० ) धातु से है ॥ ५ ( ८ ) ॥