निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २७४ ) ६ अ० ३ पा० ४ खं० भय का नाम है। क्योंकि-इस से विद्ध हुआ पुरुष प्राणों से अपवीत या रहित होता है। “ अप्वे परेहि ” अर्थात्-हे अप्वे ! रोग ! या भय ! तू ‘परेहि’ दूर हो, यह भी निगम है। यहां दूर होने की प्रार्थना के संबन्ध से ‘अप्वो’ रोग या भय ही हो सकता है। ‘अस्मति’ (४६) अनवगत अंशमयी मति या आत्म मयी या अपने को प्रकाश करने वाली आदित्य की बुद्धि के अर्थ में है। क्योंकि- स्वयम् वह प्रकाश पदार्थ ही है, उसमें कोई दूसरा पदार्थ मिश्रित नही इस लिये वह अपने प्रकाश के अर्थ किसी दूसरे प्रकाश की अपेक्षा नहीं करता । - “ ऊर्ध्वा यस्यामति र्भा अदिद्युतत्सवीमनि ” अर्थात् ‘यस्य’ जिस आदित्य की ‘ऊर्ध्वा’ सब से ऊँची ‘अमतिः’ आत्म-प्रकाशमयी बुद्धि है। जिसने ‘भाः’ अपनी ज्योतियों को ‘अदिद्यतत्’ फैलाया (प्रकाशकिया) है। ‘सवीमनि’ (प्रसवे) जिसकी आज्ञा में सब जगत् है। यह भी निगम है। ‘शृष्टी’ (५०) अनवगत ‘क्षिप्र (शीघ्र) का नाम है। क्योंकि--वह ‘आशु-शृष्टि शीघ्र अशन (व्यापन) करता है॥ ३ (१२)॥ (खं० ४) निघ०- रुशत् ॥ ५२ ॥ निरु०- “ ताँ अध्वर उशतो यक्ष्यग्ने श्रुष्टी भगं नासत्या पुरन्धिम् । ” ( ऋ० सं० ५,४, ६,४) । “ तान् ‘अध्वरे’ यज्ञे, ‘उशतः’ कामयमानान्,