निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 695, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २८१ ) ६ अ० ३ पा० ६ खं० अर्थ:-‘असूर्त्ते’ ‘सूर्त्ते’, ये दो पद अनवगत हैं। पहिले का अर्थ ‘असुसमीरिता’ (प्राण वायु से प्रेरित) और दूसरे का ‘सुसमीर्रिते’ (विस्तृत) अर्थ है।— “असूर्त्ते०-न्निमानि” अर्थात्-‘ये’ (माध्यमकाः देवगणाः) जो मध्यम लोक के देवता गण ‘असूर्त्ते’ (असुसमी- रिताः = वातसमीरिताः) वायुसे प्रेरित हुए ‘सूर्त्ते’ (सुसमी- रिते = विस्तीर्णे) विस्तृत ‘निषत्ते’ (निषण्णे) डटेहुए ‘रजसि’ (अन्तरिक्षे) अन्तरिक्ष लोकमें स्थित हैं, (ते) वे (रसेन पृथिवीं तर्पयन्तः) जलसे पृथिवी को तृप्त करते हुए ‘इमानि’ इन ‘भूतानि’ प्राणियों को ‘समकूरवन्’ करते हैं। इस मन्त्र के पूर्वार्द्ध में “ते आपजन्त” इत्यादि पाठ है। उसमें ‘ते’ (वे) पद आ गया है, और इस उत्तरार्द्ध में “ये भूतानि” यहां ‘ये’ (जो) पद आया है, किन्तु शब्दस्वभावकी मर्यादा से पहिले ‘ये’और पीछे ‘ते’ आना चाहिए। क्योंकि- जब कोई कहता है, ‘वे जाते हैं, तो प्रश्न होगा-कौन ? और जब कहेंगे-‘जो लाठी वाले हैं, वे जाते हैं,तो ‘वे’ को सुनकर पूर्वोक्त प्रश्न नहीं उठ सकता । इससे सिद्ध हुआ कि-‘ते’ पद सदा ही अपने उच्चारण से पहिले ‘ये’ पदके उच्चारण की अपेक्षा रखता है। सुतराम् मन्त्र में शब्द-स्वभाव के विपरीत ‘ते’ पदका पहिले और ‘ये’ पदका पीछे प्रयोग किया है, इसे ‘अतिक्रान्त प्रतिवचन’ कहते हैं। वक्ता की इच्छानुसार कभी २ ऐसा भी होता है। जैसा कि-‘वेजाते हैं, जो लाठी वाले हैं’ यही प्रकार स्वतन्त्र-प्रकृति मन्त्र ने भी यहां किया है। ‘अम्यक्’ (६०) यह अनवगत है। ‘अम्यक्’ क्या ? ‘अमाक्ता’ वह ३६