निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'शिप्र' हनू (ठोड़ी) या नासिकाएँ । 'हनु' कैसे ? हिंसार्थक 'हन्' (अदा०प०) धातु से है । 'नासिका' कैसे ? प्राप्ति या नमस्कार (झुकना) अर्थ में 'नस' (स्वा०प०) धातु से है । "विष्वस्व शिप्रे विमृजस्व धेने" अर्थात्- हे इन्द्र देव ! तू 'शिप्रे' अपनी ठोड़ियों को हविः के खाने के अर्थ 'विष्वस्व' चला अथवा अपनी नासिकाओं को गन्ध के सूंघने के अर्थ चला । और 'धेने' (आधस्त्ये दंष्ट्रे) नीचेकी डाढें अथवा (जिह्वोपजिह्विके) जीभ और जीभके पासके स्थान (कागली) को 'विसृजस्व' हविः भक्षण के अर्थ छोड़ (चला) यह भी निगम है । यहां हविः के भक्षणके संबन्ध से 'शिप्रे' यह हनु या नासिकाओं का नाम है । क्योंकि-भक्षण में ठोडी तो चलती ही है किन्तु गन्धभक्षण नासिका से ही होता है, इस लिये दोनों ही अर्थों का संभव है । 'धेना' (जाड़) धारणार्थक 'धा' (जु०उ०) धातु से है । क्योंकि-वह भी भक्षण के समय अन्न को पीसने के अर्थ अन्न को धारण करती है । 'रंसु' (७३) (सप्तमी का बहुवचन) अनवगत 'रमणी- येषु' (रमण करने योग्यों में) के अर्थ में है । 'रंसु' कैसे ? [L20: रमणासे । अर्थात्-क्रीडार्थक 'रम्' (भ्वा० आ०) धातु और सप्तमी विभक्ति के बहुवचन 'सु' के योगसे बनता है । "सचित्रेण चिकिते रंसु भासा" अर्थात्-'सः' वह अग्निदेव 'चित्रेण' चित्र विचित्र 'भासा' अपनी ज्योति से युक्त 'रंसु' रमणीय द्युलोक आदि स्थानों में 'चिकिते' प्रकाशता है । यह भी निगम है । यहां शब्द की समानता और अर्थ के