निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 703, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्थाने उत्तमे च । “उत द्विबर्हा अमिनः सहोभिः” ( ऋ० सं० ४, ६, ७, १ ) इत्यपि निगमो भवति । ‘अक्रः’ आक्रमणात् । “अक्रो न बभ्रिः समिथे महीनाम” [ ऋ० सं० २, ८, १५, २ ] इत्यपि निगमो भवति ॥ ‘उराणः’ उरु कुर्वाणः । “दूत ईयसे प्रदिव उराणः” ( ऋ० सं० ३, ५, ७, ३ ) इत्यपि निगमो भवति ॥ १ ॥ अर्थः-‘सृप्र’ (७१) ( सर्प ) क्यों ? सर्पण ( सरकने ) से । यह दूसरा भी ‘सृप्र’ जो सर्पि या घृत अथवा तैल का नाम है इसी ( सर्पण क्रिया के सम्बन्ध ) से है । क्यों कि-वह भी सरकता है । “सृप्रकरस्नमूतये” अर्थात्-‘सृप्रकरस्नम्’ (दीर्घबाहुम्) लम्बी भुजा वाले ( इन्द्र ) को ‘ऊतये’ अपनी रक्षा के लिये ( बुलाते हैं ) । यह भी निगम है । ‘करस्न’ बाहु ( भुज ) होते हैं । क्यों ? कर्मोंके प्रस्नाता ( करने वाले ) होते हैं । ‘सुशिप्र’ (७२) शब्द अनवगत इसी ‘सृप्र’ (७०) शब्द से व्याख्यान किया गया । अर्थात् यह भी ‘सर्पति’ या ‘सृप’ ( भ्वा० प० ) धातु से है । बाजे सुशिप्र गोमति” अर्थात्-‘सुशिप्र !’ हे सुन्दर ठोडी वाले ! या हे सुन्दर नाक वाले ! ‘गोमति’ गोओं वाले ‘वाजे’ अन्न में । यह भी निगम है ।