निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २६६ ) ५ प्र० ४ पा० ४ खं० 'ततनुष्टिः' (८४) यह अनवगत 'तितनिषु' (फैलाने की इच्छावाला) के अर्थ में है। "यो अस्मै ०-० कवासखः" इस ऋचा का प्राजापत्य (प्रजापति का पुत्र) सङ्गरण ऋषि, इन्द्र देवता, जगती छन्द है। अर्थः 'यः' जो 'अस्मै' (इन्द्राय) इस इन्द्र के लिये 'प्र'से' (अहनि) दिन में 'उत-वा' (अपिवा) 'यः' जो अथवा 'ऊधनि' (रात्रौ) रात्रि में 'सोमम्' सोम को 'सुनोति' निचोड़ता है, (सः) वह (अह) निश्चय 'द्युमान्' (द्योतनवान्) प्रकाशवान् 'भवति' होता है। और फिर जो इस से विपरीत पुरुष है, उस (अपसन्तानात्-अपेत्यम्) पूर्वजों के आचरित धर्म मार्ग से अलग हुये वा कर्मों से रहित हुयेको अर्थात्-'कर्म मत करो' ऐसा कहने वाले को 'ततनुष्टिम्' 'तितनिषुम्' अपने धन को अनेक वाणिज्य आदि के प्रकारों से बढ़ाने वाले किन्तु इन्द्र देव की सेवा न करने वाले को 'तनूशुभ्रम्' (तनूशोभयिता- रम् = अलङ्करिष्णुम्) अपने शरीर को ही सजाने वाले, किन्तु (अयज्वानम्) देव का यजन न करने वाले को, और 'यः' जो 'कवासखः' दुराचारियों से मित्रता रखने वाला है, उसे 'शक्रः' समर्थ 'मघवा' इन्द्र देव 'अप-अप-ऊहति' (अपोहति- अपोहति) बार बार नाश करता है। कोई व्याख्याकार 'प्र- कवासखः' को 'तनूशुभ्रम्' का विशेषण बताते हैं। उनका अभिप्राय है, कि-जो शौकीन शरीर के ही पोषण में इष्ट धन का व्यय करते हैं, वे कदाचित् सत्पुरुषों का संग क- वाने हों, तो सुमार्ग में आ सकते हैं, किन्तु ऐसे आदमी यदि 'कवासख' दुर्जनों के संगी होवें, तो उन के सुमार्ग म आने की कोई आशा नहीं है, इस लिये इन्द्र देव उनका नाश ही कर